"अपनी अपनी बीमारी" हिंदी के अप्रतिम व्यंग्यकार Harishankar Parsai का चर्चित व्यंग्य-निबंध संग्रह है। यह कृति मनुष्य और समाज की उन मानसिक, सामाजिक और नैतिक "बीमारियों" का तीखा विश्लेषण करती है, जो हमारे व्यवहार, विचार और सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बन चुकी हैं। परसाई अपने विशिष्ट व्यंग्य-बोध के माध्यम से पाठक को हँसाते भी हैं और भीतर तक बेचैन भी करते हैं।
इस पुस्तक में लेखक ने पाखंड, अवसरवाद, अंधविश्वास, भ्रष्टाचार, सत्ता-लोलुपता, मध्यवर्गीय मानसिकता और सामाजिक विसंगतियों पर तीखे प्रहार किए हैं। परसाई का मानना है कि हर व्यक्ति अपनी-अपनी किसी न किसी बीमारी से ग्रस्त है—किसी को प्रतिष्ठा का रोग है, किसी को नैतिकता का दिखावा करने की बीमारी, किसी को सत्ता का नशा और किसी को अंधभक्ति का जुनून। यही "बीमारियाँ" समाज की सामूहिक चेतना को प्रभावित करती हैं।
हरिशंकर परसाई का व्यंग्य केवल मनोरंजन नहीं करता, बल्कि आत्मालोचन के लिए विवश करता है। वे व्यक्ति विशेष पर नहीं, बल्कि उन प्रवृत्तियों पर प्रहार करते हैं जो समाज को भीतर से खोखला करती हैं। उनकी भाषा सरल, बोलचाल की, चुटीली और अत्यंत प्रभावशाली है। सामान्य जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं के माध्यम से वे बड़े सामाजिक और राजनीतिक प्रश्न खड़े कर देते हैं।
साहित्यिक दृष्टि से "अपनी अपनी बीमारी" हिंदी व्यंग्य साहित्य की महत्वपूर्ण कृतियों में से एक है। यह संग्रह आज भी उतना ही प्रासंगिक है, क्योंकि जिन सामाजिक और मानसिक विकृतियों की ओर परसाई ने संकेत किया था, वे आज भी हमारे समय में मौजूद हैं। उनकी दृष्टि मानवीय है, लेकिन समझौता-विहीन भी।
Your cart is empty!