Bhramar Geet Saar

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  • Format: Paper Back
  • Publish Years: 2026
  • Total page: 160
  • Language: HINDI

भ्रमरगीत सार हिंदी साहित्य की एक अत्यंत महत्वपूर्ण कृति है, जिसका संपादन हिंदी के महान आलोचक, इतिहासकार और चिंतक आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने किया है। यह ग्रंथ मूलतः महाकवि सूरदास के प्रसिद्ध काव्य-ग्रंथ सूरसागर के भ्रमरगीतप्रसंग से चयनित पदों का संकलन है। आचार्य शुक्ल ने सूरदास के विस्तृत भ्रमरगीत से लगभग चार सौ उत्कृष्ट पदों का चयन कर उन्हें भ्रमरगीत सारके रूप में प्रस्तुत किया, जिससे पाठकों और विद्यार्थियों को इस अमूल्य काव्य-धरोहर का साररूप उपलब्ध हो सके।

भ्रमरगीतका आधार भागवत पुराण का वह प्रसिद्ध प्रसंग है, जिसमें श्रीकृष्ण मथुरा चले जाने के बाद ब्रज की गोपियाँ उनके विरह में व्याकुल हैं। कृष्ण अपने मित्र उद्धव को ब्रज भेजते हैं ताकि वे गोपियों को ज्ञान, योग और निर्गुण ब्रह्म का उपदेश देकर उनके दुःख को कम कर सकें। किंतु गोपियाँ उद्धव के दार्शनिक उपदेशों को स्वीकार नहीं करतीं। उनके लिए प्रेम ही सर्वोच्च सत्य है। इसी संवाद और वैचारिक टकराव से भ्रमरगीतका जन्म होता है।

काव्य में एक भ्रमर (भँवरा) प्रतीक के रूप में उपस्थित होता है। गोपियाँ उसी भ्रमर को संबोधित करके श्रीकृष्ण, उद्धव और प्रेम-विरह की अपनी अनुभूतियों को व्यक्त करती हैं। उनके कथनों में व्यंग्य है, उपालंभ है, करुणा है, स्मृति है और प्रेम की चरम तन्मयता है। यही कारण है कि भ्रमरगीत सारकेवल कृष्ण-भक्ति का काव्य नहीं, बल्कि मानवीय हृदय की गहनतम भावनाओं की अभिव्यक्ति भी है।

इस कृति का केंद्रीय भाव विरह है, किंतु यह विरह केवल सांसारिक प्रेम का नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा के मिलन-वियोग का प्रतीक भी है। गोपियों का कृष्ण के प्रति समर्पण भक्ति की उस पराकाष्ठा को व्यक्त करता है जहाँ तर्क, ज्ञान और दर्शन प्रेम के सामने गौण हो जाते हैं। सूरदास ने सगुण भक्ति की श्रेष्ठता को अत्यंत काव्यात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है, जबकि उद्धव के माध्यम से निर्गुण ज्ञानमार्ग का प्रतिनिधित्व कराया है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इस संकलन के माध्यम से सूरदास की काव्य प्रतिभा, भाव-संपदा, भाषा-सौंदर्य और मनोवैज्ञानिक सूक्ष्मता को विशेष रूप से रेखांकित किया है। भ्रमरगीत सारमें प्रेम, भक्ति, दर्शन और काव्य-कला का ऐसा अद्भुत समन्वय मिलता है, जो हिंदी साहित्य में विरल है। गोपियों के संवादों में स्त्री-हृदय की संवेदनशीलता, प्रेम की निष्कामता और भक्ति की उत्कटता का अप्रतिम चित्रण मिलता है।

भाषा की दृष्टि से यह कृति ब्रजभाषा की मधुरता, संगीतात्मकता और भावाभिव्यक्ति का श्रेष्ठ उदाहरण है। उपमा, रूपक, व्यंग्य, प्रतीक और अन्य काव्य-तत्त्वों का अत्यंत प्रभावशाली प्रयोग इसे हिंदी भक्ति साहित्य की अमूल्य निधि बनाता है।

भ्रमरगीत सारकेवल भक्तिकालीन काव्य का संकलन नहीं है, बल्कि भारतीय प्रेम-दर्शन, भक्ति-साधना और काव्य-सौंदर्य का एक अनुपम ग्रंथ है। यह कृति पाठकों को प्रेम और भक्ति की उस दुनिया में ले जाती है, जहाँ ज्ञान से अधिक हृदय की अनुभूति का महत्व है और जहाँ विरह स्वयं मिलन का मार्ग बन जाता है।

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Leslie Alexander
February 10, 2024 at 2:37 pm

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