"हिंदी साहित्य का दलित पक्ष" डॉ. Rishi Kumar द्वारा संपादित एक महत्वपूर्ण आलोचनात्मक एवं शोधपरक ग्रंथ है, जिसमें हिंदी साहित्य में दलित चेतना, दलित विमर्श, सामाजिक न्याय और हाशिए के समुदायों के प्रतिनिधित्व का बहुआयामी अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। यह पुस्तक दलित साहित्य और मुख्यधारा हिंदी साहित्य के अंतर्संबंधों को समझने का गंभीर प्रयास करती है।
पुस्तक का मूल उद्देश्य हिंदी साहित्य में उपस्थित उन स्वर, अनुभव और संघर्षों को पहचानना है, जिन्हें लंबे समय तक साहित्यिक विमर्श में अपेक्षित स्थान नहीं मिला। इसमें दलित जीवन, सामाजिक असमानता, जातिगत उत्पीड़न, अस्मिता-बोध, प्रतिरोध और सामाजिक परिवर्तन के प्रश्नों पर विभिन्न विद्वानों के लेख संकलित हैं।
यह कृति दलित साहित्य को केवल एक साहित्यिक धारा के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा के आंदोलन के रूप में देखती है। पुस्तक में दलित विमर्श के वैचारिक आधार, डॉ. भीमराव आंबेडकर की चिंतनधारा, हिंदी साहित्य में दलित प्रतिनिधित्व तथा समकालीन दलित लेखन की प्रवृत्तियों पर विचार किया गया है।
साहित्यिक दृष्टि से यह पुस्तक आलोचना, समाजशास्त्र और सांस्कृतिक अध्ययन का संगम है। इसमें हिंदी साहित्य की परंपरा का पुनर्पाठ करते हुए यह प्रश्न उठाया गया है कि साहित्य में समानता, स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के मूल्य किस प्रकार अभिव्यक्त हुए हैं। शोधार्थियों, विद्यार्थियों, अध्यापकों और दलित विमर्श में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह एक उपयोगी संदर्भ-ग्रंथ है।
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