- 10-05-2026 06:00 pm to 10-05-2026 09:00 pm
- आभासीय संगोष्ठी कोलकाता
माँ का पुनर्पाठ: हिंदी साहित्य में मातृत्व, स्मृति, देह, तकनीक और प्रतिरोध का नया विमर्श
भारतीय समाज और साहित्य में “माँ” को लंबे समय तक त्याग, ममता और पवित्रता के आदर्श प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। किंतु समकालीन हिंदी साहित्य ने इस पारंपरिक छवि को चुनौती देते हुए माँ को एक जीवित मनुष्य, संघर्षशील स्त्री और स्वतंत्र अस्मिता के रूप में देखने की नई दृष्टि विकसित की है।
इन्हीं महत्वपूर्ण प्रश्नों और बदलते साहित्यिक-सामाजिक संदर्भों को केंद्र में रखते हुए “शब्दभूमि प्रकाशन” राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित कर रहा है
'माँ का पुनर्पाठ : हिंदी साहित्य में मातृत्व, स्मृति, देह, तकनीक और प्रतिरोध का नया विमर्श'
इस संगोष्ठी में हिंदी साहित्य में मातृत्व की बदलती अवधारणा, स्त्री-अस्मिता, प्रसव और देह का यथार्थ, कामकाजी माँ का संघर्ष, दलित-आदिवासी मातृत्व, डिजिटल युग की माँ, सिंगल मदर, सरोगेसी, वैकल्पिक मातृत्व, मानसिक स्वास्थ्य तथा हिंदी कविता और कथा साहित्य में मातृ-विमर्श की नई अभिव्यक्तियों पर गंभीर चर्चा की जाएगी।
यह कार्यक्रम शोधार्थियों, विद्यार्थियों, प्राध्यापकों, साहित्यकारों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और साहित्य एवं समाज के गंभीर पाठकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी होगा।
📅 दिनांक : 10 मई 2026
🕕 समय : सायं 6 बजे
📍 माध्यम : Zoom (आभासी संगोष्ठी)
आइए, मातृत्व को केवल भावुक प्रतीक नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और मानवीय अनुभव के रूप में समझने की इस गंभीर साहित्यिक यात्रा का हिस्सा बनें।