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समकालीन कविता में सामाजिक परिवर्तन की चेतना: विश्व कविता दिवस पर शब्दभूमि प्रकाशन की राष्ट्रीय संगोष्ठी

कोलकाता, 21 मार्च। विश्व कविता दिवस के अवसर पर शब्दभूमि प्रकाशन द्वारा आयोजित ऑनलाइन संगोष्ठी 'समकालीन कविता में सामाजिक परिवर्तन की चेतना' विषय पर केंद्रित रही। इस प्रभावशाली आयोजन में देश के विभिन्न हिस्सों से जुड़े साहित्यकारों, शोधकर्ताओं और रचनाकारों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया और कविता की सामाजिक भूमिका पर अपने विचार प्रस्तुत किए।

कार्यक्रम का शुभारंभ संचालिका डॉ. रेखा कुमारी त्रिपाठी (हिंदी विश्वविद्यालय, हावड़ा) द्वारा किया गया। उन्होंने अपने उद्घाटन वक्तव्य में विश्व कविता दिवस के इतिहास, वैश्विक महत्व और साहित्यिक परंपरा में कविता की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कविता केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समाज के अंतर्विरोधों को उजागर करने और परिवर्तन की चेतना जगाने का एक प्रभावशाली माध्यम है।

संगोष्ठी का उद्देश्य

इस संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य समकालीन कविता के माध्यम से समाज में हो रहे परिवर्तनों, संघर्षों और चेतनात्मक हस्तक्षेप को समझना तथा उसके प्रभावों का विश्लेषण करना था।

प्रमुख विमर्श के बिंदु

संगोष्ठी में वक्ताओं ने समकालीन कविता के विविध आयामों पर विचार रखते हुए निम्नलिखित बिंदुओं पर विशेष जोर दिया-

·         सामाजिक अन्याय और असमानता के विरुद्ध कविता की भूमिका

·         स्त्री-विमर्श और लैंगिक समानता

·         पर्यावरण संकट और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता

·         मानवीय मूल्यों का क्षरण और पुनर्स्थापन

·         जनचेतना जागरण में कविता की प्रभावशीलता

वक्ताओं ने यह स्पष्ट किया कि आज की कविता केवल सौंदर्यबोध तक सीमित नहीं है, बल्कि वह समाज के जटिल प्रश्नों से सीधे संवाद करती है और परिवर्तन की दिशा में प्रेरित करती है।

देशभर से साहित्यकारों की सहभागिता

इस संगोष्ठी में शिमला, पलामू, बिलासपुर, मुंबई, मैसुरू, धार, जालना, परभणी, वर्धा, खंडवा, उदयपुर, गोड्डा आदि स्थानों से जुड़े साहित्यकारों ने अपने विचार साझा किए।

इन वक्ताओं में सपना चंदेल, जया कुमारी, शांति सोनी, प्रीति साहू, प्रियंका सिंह, शोभा डी., डॉ. महेंद्र रणदा, डॉ. जया सुभाष बागुल, नितिन सुभाषराव कुंभकर्ण, डॉ. मनोज प्रभाकर ढोने, आनंद कुमार जैन, डॉ. रुचि पालीवाल और अमन कुमार प्रमुख रहे।


संचालन एवं समन्वय

कार्यक्रम का संचालन डॉ. रेखा कुमारी त्रिपाठी ने प्रभावशाली ढंग से किया, जबकि प्रिया श्रीवास्तव ने संयोजक के रूप में सभी प्रतिभागियों के बीच उत्कृष्ट समन्वय स्थापित किया।


समापन और धन्यवाद

कार्यक्रम के अंत में विनोद यादव ने सभी वक्ताओं, श्रोताओं और आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के साहित्यिक आयोजन न केवल संवाद को समृद्ध करते हैं, बल्कि नई पीढ़ी में रचनात्मक चेतना जगाने का कार्य भी करते हैं।

निष्कर्ष

यह संगोष्ठी इस तथ्य को रेखांकित करती है कि समकालीन कविता आज भी समाज में परिवर्तन की एक सशक्त धारा के रूप में कार्य कर रही है। कविता केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि एक जीवंत चेतना है, जो समय की चुनौतियों से टकराकर समाज को नई दिशा देने की क्षमता रखती है।