Alka By Suryakant Tripathi Nirala

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अलका’: यथार्थ, वर्ग-संघर्ष और जनजीवन का सजीव आख्यान

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का उपन्यास अलका हिंदी कथा-साहित्य में यथार्थवादी चेतना का एक सशक्त उदाहरण है, जिसमें अवध क्षेत्र के किसानों और जनसाधारण के अभावग्रस्त, पीड़ित और संघर्षशील जीवन का अत्यंत मार्मिक तथा प्रामाणिक चित्रण प्रस्तुत किया गया है।

इस उपन्यास की पृष्ठभूमि भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के उस संक्रमणकाल से जुड़ी है, जब प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात महात्मा गांधी ने आंदोलन का नेतृत्व अपने हाथों में लिया और राष्ट्रीय चेतना को व्यापक जनाधार प्रदान किया। इसी कालखंड में शिक्षित, संपन्न और अभिजात वर्ग के अनेक व्यक्ति विशेषतः वकील, बैरिस्टर और पूँजीपति आंदोलन से जुड़े। यद्यपि उनकी प्रतिबद्धता स्वतंत्रता के प्रश्न पर निर्विवाद थी, तथापि किसानों और मजदूरों की वास्तविक पीड़ाओं से उनका संबंध अपेक्षाकृत सीमित ही रहा।

निराला इस उपन्यास में उस सूक्ष्म किंतु महत्त्वपूर्ण अंतर्विरोध को उभारते हैं, जहाँ स्वतंत्रता की आकांक्षा और वर्गीय स्वार्थ परस्पर उलझते दिखाई देते हैं। नेतृत्व का एक वर्ग किसानों और मजदूरों के स्वायत्त उभार को लेकर आशंकित था, क्योंकि उसकी प्राथमिकता व्यापक सामाजिक परिवर्तन से अधिक अपने वर्गीय हितों की सुरक्षा में निहित थी। अलका इस निहित स्वार्थ को निर्भीकता और स्पष्टता के साथ उद्घाटित करता है।

विशेष उल्लेखनीय है जमींदारी व्यवस्था के विरुद्ध किसानों के विद्रोह का चित्रण, जो अपनी यथार्थपरकता, तीव्रता और संवेदनात्मक प्रामाणिकता के कारण हिंदी साहित्य में विरल प्रतीत होता है। यहाँ निराला केवल कथाकार नहीं, बल्कि एक सजग सामाजिक दृष्टा के रूप में उपस्थित होते हैं, जो जनजीवन की करुण सच्चाइयों को बिना किसी अलंकरण के सामने रखते हैं।

भाषा और शिल्प की दृष्टि से भी अलका, उनके पूर्ववर्ती उपन्यास अप्सरा की अपेक्षा अधिक परिपक्व, संयत और प्रौढ़ प्रतीत होता है। इसमें भावुकता की जगह अनुभवजन्य गहराई और सामाजिक यथार्थ की ठोस अभिव्यक्ति प्रमुख हो उठती है।

₹180

₹199 10% OFF
  • Format: Paper Back
  • Publish Years: 2026
  • Total page: 200
  • Language: HINDI

अलका हिंदी साहित्य की उन विशिष्ट कृतियों में है, जो केवल कथा कहने तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि अपने समय की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जटिलताओं को गहन संवेदना के साथ उद्घाटित करती हैं। निराला ने इस उपन्यास में ग्रामीण भारत के यथार्थ, विशेषतः किसानों और मजदूरों की पीड़ा, शोषण और संघर्ष को अत्यंत प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत किया है।

यह कृति स्वतंत्रता आंदोलन के उस दौर की पड़ताल करती है, जहाँ एक ओर राष्ट्रीय मुक्ति का स्वप्न आकार ले रहा था, वहीं दूसरी ओर वर्गीय असमानताएँ और अंतर्विरोध भी तीव्र रूप में उपस्थित थे। जमींदारी शोषण के विरुद्ध किसानों का प्रतिरोध इस उपन्यास का केंद्रीय स्वर बनकर उभरता है।

भाषा की परिपक्वता, कथ्य की गंभीरता और सामाजिक दृष्टि की तीक्ष्णता अलका को हिंदी के श्रेष्ठ यथार्थवादी उपन्यासों में विशिष्ट स्थान प्रदान करती है। यह पुस्तक उन पाठकों के लिए अत्यंत उपयुक्त है जो साहित्य के माध्यम से समाज की गहरी संरचनाओं और ऐतिहासिक परिवर्तनों को समझना चाहते हैं।

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Leslie Alexander
February 10, 2024 at 2:37 pm

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