JALTE HUE VAN KA VASANT

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₹150 20% OFF
  • Format: Paper Back
  • Publish Years: 2026
  • Total page: 112
  • Language: HINDI

"जलते हुए वन का वसन्त" हिंदी के जनप्रिय कवि और आधुनिक हिंदी कविता के सशक्त हस्ताक्षर दुष्यंत कुमार का महत्त्वपूर्ण कविता-संग्रह है। यह संग्रह उनकी रचनात्मक चेतना के उस दौर का प्रतिनिधित्व करता है, जहाँ व्यक्तिगत अनुभूति, सामाजिक यथार्थ, राजनीतिक विडंबना और मानवीय संवेदना एक साथ स्वर ग्रहण करती हैं। यह कृति नई कविता आंदोलन की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिनी जाती है।

दुष्यंत कुमार को सामान्यतः उनकी ग़ज़लों और संग्रह "साये में धूप" के लिए याद किया जाता है, लेकिन "जलते हुए वन का वसन्त" उनकी काव्य-दृष्टि का एक व्यापक और गहन परिचय कराता है। इस संग्रह की कविताएँ केवल सौंदर्यबोध तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे अपने समय की सामाजिक और राजनीतिक बेचैनी को भी मुखर करती हैं।

पुस्तक का शीर्षक अपने आप में एक शक्तिशाली प्रतीक है। "जलता हुआ वन" विनाश, अशांति, अन्याय और विघटन का संकेत देता है, जबकि "वसन्त" आशा, पुनर्जन्म और परिवर्तन का प्रतीक है। दुष्यंत कुमार इसी विरोधाभास के भीतर जीवन की संभावनाओं को तलाशते हैं। वे निराशा के बीच भी उम्मीद का दीप जलाए रखते हैं।

इस संग्रह में शामिल कविताएँ व्यवस्था की विसंगतियों, लोकतंत्र की चुनौतियों, आम आदमी की पीड़ा, युद्ध, देशप्रेम, इतिहास और मनुष्य के अस्तित्वगत संघर्षों पर गहन विचार प्रस्तुत करती हैं। "देश-प्रेम", "योग-संयोग", "यात्रानुभूति", "उपक्रम", "वसन्त आ गया" और "युद्ध और युद्ध-विराम के बीच" जैसी कविताएँ कवि की वैचारिक प्रतिबद्धता और संवेदनशीलता का परिचय देती हैं।

दुष्यंत कुमार की भाषा सरल, सीधी और प्रभावशाली है। वे जटिल अनुभवों को भी बिना अलंकारिक बोझ के सहज शब्दों में व्यक्त करते हैं। यही कारण है कि उनकी कविताएँ पाठक को चौंकाती नहीं, बल्कि भीतर तक "हॉन्ट" करती हैं और लंबे समय तक स्मृति में बनी रहती हैं।

साहित्यिक दृष्टि से

"जलते हुए वन का वसन्त" आधुनिक हिंदी कविता का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। यह संग्रह व्यक्ति और व्यवस्था के बीच संघर्ष, इतिहास के दबाव और मानवीय जिजीविषा की कथा कहता है। दुष्यंत कुमार की कविताएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, क्योंकि वे सत्ता से प्रश्न पूछने और मनुष्य के पक्ष में खड़े होने का साहस देती हैं।

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