"लहर" हिंदी साहित्य के महान कवि Jaishankar Prasad की प्रसिद्ध काव्य-कृति है, जो छायावादी काव्यधारा की उत्कृष्ट उपलब्धियों में गिनी जाती है। इसका प्रकाशन 1933 में हुआ था और इसे प्रसाद की परिपक्व काव्य-दृष्टि का प्रतिनिधि संग्रह माना जाता है। यह कृति उनकी प्रसिद्ध रचनाओं आँसू और Kamayani के बीच की महत्वपूर्ण कड़ी मानी जाती है।
"लहर" एक कविता-संग्रह है, जिसमें प्रकृति, प्रेम, सौंदर्य, इतिहास, दर्शन, करुणा, राष्ट्रीय चेतना और मानवीय संवेदनाओं का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। इस संग्रह में कुल 33 कविताएँ संकलित हैं, जिनमें "प्रलय की छाया", "अशोक की चिंता", "ले चल वहाँ भुलावा देकर", "मधुप गुनगुनाकर कह जाता" जैसी प्रसिद्ध कविताएँ शामिल हैं।
इस काव्य-संग्रह में कवि ने जीवन को एक गतिशील लहर की तरह देखा है, जो निरंतर गति, परिवर्तन और संवेदना का प्रतीक है। प्रकृति के विविध रूपों के माध्यम से कवि ने मानव-मन की सूक्ष्म अनुभूतियों को व्यक्त किया है। प्रेम, विरह, स्मृति, आशा, सौंदर्य और आत्मचिंतन की भावनाएँ पूरे संग्रह में तरंगित होती रहती हैं।
साहित्यिक दृष्टि से "लहर" छायावाद की सौंदर्य चेतना, प्रतीकात्मकता, संगीतात्मकता और भावुकता का उत्कृष्ट उदाहरण है। प्रसाद की भाषा संस्कृतनिष्ठ होते हुए भी अत्यंत मधुर, लयात्मक और चित्रात्मक है। प्रकृति और मानवीय भावनाओं का जो सूक्ष्म एवं कलात्मक चित्रण इस संग्रह में मिलता है, वह हिंदी काव्य की अमूल्य धरोहर है।
"लहर" केवल कविता-संग्रह नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं, जीवन-दर्शन और सौंदर्य-बोध की एक अनुपम काव्य-यात्रा है। हिंदी कविता, छायावाद और जयशंकर प्रसाद के साहित्य को समझने के लिए यह कृति अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
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