"डागर व ध्रुपद : दिव्य विरासत" भारतीय शास्त्रीय संगीत की प्राचीनतम और सर्वाधिक प्रतिष्ठित परंपराओं में से एक ध्रुपद गायकी तथा उसके महान संवाहक डागर परिवार की संगीत-साधना पर आधारित एक महत्वपूर्ण पुस्तक है। लेखिका हुमरा कुरैशी ने इस कृति में ध्रुपद की आध्यात्मिक गहराई, ऐतिहासिक विकास और डागर घराने की विलक्षण परंपरा का सजीव एवं शोधपूर्ण चित्रण किया है।
ध्रुपद को हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की सबसे प्राचीन जीवित परंपराओं में माना जाता है। यह संगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि साधना, ध्यान और आध्यात्मिक अनुभूति का मार्ग है। पुस्तक में उस्ताद फैयाजुद्दीन डागर और डागर परिवार की कई पीढ़ियों की संगीत-यात्रा का वर्णन मिलता है, जिन्होंने सदियों तक इस विरासत को जीवित रखा।
लेखिका ने डागर वंश की लगभग 20 पीढ़ियों की संगीत परंपरा, उनके योगदान, संघर्ष और ध्रुपद के संरक्षण में निभाई गई भूमिका को विस्तार से प्रस्तुत किया है। पुस्तक में दुर्लभ चित्रों और ऐतिहासिक संदर्भों के माध्यम से भारतीय संगीत की इस अमूल्य धरोहर को पाठकों के सामने जीवंत किया गया है।
यह पुस्तक संगीत-प्रेमियों, शोधार्थियों, कलाकारों तथा भारतीय सांस्कृतिक विरासत में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए एक अनिवार्य पठनीय ग्रंथ है।
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