"मंत्री क्या बने लाट हो गए" सुप्रसिद्ध कथाकार जयनंदन का तीखे व्यंग्य और सामाजिक यथार्थ से भरपूर कहानी-संग्रह है। यह संग्रह सत्ता, राजनीति, नौकरशाही और बदलते सामाजिक मूल्यों पर करारी चोट करता है। जयनंदन अपनी पैनी दृष्टि और जनपक्षधर लेखन के लिए जाने जाते हैं, और इस पुस्तक में भी वे आम आदमी की पीड़ा, व्यवस्था की विसंगतियों और सत्ता के अहंकार को बेनकाब करते हैं।
शीर्षक कहानी "मंत्री क्या बने लाट हो गए" राजनीति के उस चरित्र को उजागर करती है, जहाँ जनसेवा का वादा करने वाले लोग सत्ता प्राप्त होते ही जनता से कट जाते हैं। साधारण पृष्ठभूमि से आए नेता किस प्रकार पद, प्रतिष्ठा और शक्ति के मद में अपनी जड़ों को भूल जाते हैं, यह कहानी उसी विडंबना का सशक्त चित्रण करती है।
इस संग्रह की अन्य कहानियाँ भी सामाजिक अन्याय, पाखंड, भ्रष्टाचार, आदिवासी जीवन, वर्गीय असमानता और मानवीय मूल्यों के क्षरण जैसे विषयों को उठाती हैं। लेखक का व्यंग्य केवल हँसाता नहीं, बल्कि पाठकों को अपने समय की वास्तविकताओं पर गंभीरता से सोचने के लिए विवश करता है। अमेज़न पर उपलब्ध विवरण के अनुसार, संग्रह की कहानियाँ मृत्यु-संस्कारों के पाखंड, सत्ता के आदिवासी-विरोधी रवैये और सामाजिक विसंगतियों पर तीखा प्रहार करती हैं।
"मंत्री क्या बने लाट हो गए" समकालीन हिन्दी कहानी, राजनीतिक व्यंग्य और सामाजिक सरोकारों में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए एक महत्त्वपूर्ण और संग्रहणीय कृति है।
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