"अंदाज़-ए-बयाँ उर्फ़ रवि कथा" हिंदी की वरिष्ठ साहित्यकार ममता कालिया की अत्यंत आत्मीय, मार्मिक और स्मृतिपरक कृति है। यह पुस्तक केवल प्रसिद्ध कथाकार और संपादक रवीन्द्र कालिया के जीवन का वृत्तांत नहीं, बल्कि हिंदी साहित्य की एक पूरी पीढ़ी, उसके संघर्षों, दोस्तियों, साहित्यिक बहसों और सांस्कृतिक परिवेश का जीवंत दस्तावेज़ है। इस कृति को "रवि कथा" के रूप में विशेष पहचान मिली और यह साहित्यिक जगत में व्यापक रूप से चर्चित रही।
इस पुस्तक में ममता कालिया ने अपने पति रवीन्द्र कालिया को किसी महिमामंडित साहित्यिक व्यक्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत, जिद्दी, विनोदी, संघर्षशील और बेहद मानवीय व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया है। इलाहाबाद, दिल्ली और साहित्यिक दुनिया की अनेक यादें, लेखक-मित्रों के संस्मरण, पारिवारिक प्रसंग और रवीन्द्र कालिया की संपादकीय यात्रा इस कृति को विशिष्ट बनाते हैं।
"अंदाज़-ए-बयाँ उर्फ़ रवि कथा" का सबसे बड़ा आकर्षण इसकी आत्मीयता और ईमानदारी है। इसमें एक पत्नी का प्रेम है, एक सहयात्री का साक्ष्य है और एक लेखिका की निष्पक्ष दृष्टि भी। ममता कालिया रवीन्द्र कालिया की खूबियों के साथ उनकी कमज़ोरियों, असुरक्षाओं और मानवीय विरोधाभासों को भी उतनी ही स्पष्टता से दर्ज करती हैं। यही बेबाकी इस पुस्तक को साधारण संस्मरण से आगे ले जाकर एक महत्वपूर्ण साहित्यिक कृति बना देती है।
यह पुस्तक हिंदी साहित्य की उस दुनिया का भी परिचय कराती है, जहाँ लेखकों की आर्थिक कठिनाइयाँ, साहित्यिक राजनीति, पत्र-पत्रिकाओं का महत्व, मित्रताओं की गर्माहट और रचनात्मक संघर्ष एक साथ मौजूद थे। इसके माध्यम से पाठक धर्मवीर भारती, मोहन राकेश, ज्ञानरंजन, दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह जैसे अनेक साहित्यिक व्यक्तित्वों के समय और परिवेश की झलक भी पाता है।
साहित्यिक दृष्टि से यह कृति संस्मरण, जीवनी और आत्मकथात्मक गद्य का अद्भुत संगम है। यह केवल रवीन्द्र कालिया की कथा नहीं, बल्कि हिंदी साहित्य के एक महत्वपूर्ण दौर की सामूहिक स्मृति है।
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