"तिरछी रेखाएँ" हिंदी के महान व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की एक महत्त्वपूर्ण आत्मकथात्मक कृति है, जिसमें उन्होंने अपने जीवनानुभवों, साहित्यिक संघर्षों, समकालीन समाज और अपने समय के बौद्धिक परिवेश को बेबाकी और आत्मीयता के साथ अभिव्यक्त किया है। यह पुस्तक केवल संस्मरण नहीं, बल्कि एक सजग लेखक की वैचारिक यात्रा का दस्तावेज़ है।
परसाई अपनी विशिष्ट व्यंग्यात्मक दृष्टि के साथ जीवन की सीधी रेखाओं के पीछे छिपी "तिरछी सच्चाइयों" को उजागर करते हैं। वे अपने बचपन, आर्थिक संघर्षों, शिक्षकीय जीवन, साहित्यिक मित्रताओं और लेखकीय अनुभवों को याद करते हुए समाज की विसंगतियों, पाखंड, भ्रष्टाचार और नैतिक पतन पर तीखी टिप्पणी करते हैं।
इस कृति की सबसे बड़ी विशेषता इसकी निर्भीक ईमानदारी है। परसाई स्वयं को भी आलोचना से मुक्त नहीं रखते। वे अपने समय के साहित्यिक संसार की राजनीति, विचारधारात्मक संघर्षों और सामाजिक विरोधाभासों को उसी स्पष्टता से देखते हैं, जिस स्पष्टता से वे अपने निजी जीवन का विश्लेषण करते हैं।
उनकी भाषा सहज, बोलचाल की और तीक्ष्ण व्यंग्य से भरपूर है। वे पाठक को केवल हँसाते नहीं, बल्कि बेचैन करते हैं, सोचने के लिए विवश करते हैं। उनके व्यंग्य में करुणा, मानवीय संवेदना और परिवर्तन की आकांक्षा भी निहित रहती है।
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