"यशोधरा की आत्मकथा" वरिष्ठ साहित्यकार बाबूराम त्रिपाठी का एक अत्यंत संवेदनशील और कल्पनाशील पौराणिक-आत्मकथात्मक उपन्यास है। इस कृति में लेखक ने यशोधरा—राजकुमार सिद्धार्थ (गौतम बुद्ध) की पत्नी—को स्वयं अपनी कहानी कहने का अवसर दिया है। भारतीय साहित्य में प्रायः बुद्ध के महाप्रस्थान, ज्ञान-प्राप्ति और उपदेशों पर अधिक लिखा गया है, लेकिन इस उपन्यास में उस स्त्री की मौन पीड़ा, प्रतीक्षा और आत्मिक संघर्ष को केंद्र में रखा गया है, जिसे इतिहास ने अक्सर हाशिए पर छोड़ दिया।
यशोधरा केवल बुद्ध की पत्नी नहीं थीं; वे एक संवेदनशील स्त्री, एक राजकुमारी, एक पत्नी और राहुल की माँ भी थीं। जब सिद्धार्थ सत्य की खोज में एक रात राजमहल छोड़कर चले जाते हैं, तब उनके पीछे छूट जाती है यशोधरा की एक लंबी प्रतीक्षा। यह उपन्यास उसी प्रतीक्षा, आघात, प्रश्नों और आत्मबोध की कथा है।
लेखक ने प्रथम पुरुष शैली ("मैं") का प्रयोग करते हुए यशोधरा के अंतर्मन को स्वर दिया है। वह पूछती हैं—क्या त्याग केवल पुरुष का विशेषाधिकार है? क्या आध्यात्मिक मुक्ति की यात्रा में पीछे छूट जाने वालों का दुःख महत्वहीन है? क्या एक स्त्री का प्रेम, धैर्य और मौन भी तपस्या नहीं है?
उपन्यास में कपिलवस्तु का राजसी परिवेश, सिद्धार्थ का वैराग्य, राहुल का बचपन, यशोधरा का आत्मसम्मान और अंततः बुद्ध से उनका पुनर्मिलन अत्यंत मार्मिक ढंग से चित्रित किया गया है। बाबूराम त्रिपाठी ने पौराणिक कथा को आधुनिक स्त्री-दृष्टि और मानवीय संवेदनाओं से जोड़ते हुए इसे एक नई व्याख्या प्रदान की है।
"यशोधरा की आत्मकथा" पौराणिक पुनर्पाठ (Mythological Retelling) की एक महत्त्वपूर्ण कृति है। यह केवल बुद्धकालीन इतिहास का पुनर्निर्माण नहीं करती, बल्कि स्त्री-अस्मिता, त्याग, प्रेम और आत्मसम्मान जैसे शाश्वत प्रश्नों को भी उठाती है। इसकी भाषा सरल, भावपूर्ण और काव्यात्मक है, जो पाठक को यशोधरा के मनोविश्व में प्रवेश करा देती है।
यह उपन्यास उन पाठकों के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, जो बौद्ध साहित्य, पौराणिक पुनर्कथन और स्त्री-विमर्श में रुचि रखते हैं।
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