"अंकों का सांस्कृतिक वैभव" प्रख्यात लेखक और शोधपरक चिंतक शिव मृदुल की एक विशिष्ट और ज्ञानवर्धक कृति है, जिसमें भारतीय संस्कृति, धर्म, दर्शन, लोकजीवन और साहित्य में अंकों (संख्याओं) के सांस्कृतिक, प्रतीकात्मक और आध्यात्मिक महत्व का विस्तृत विवेचन किया गया है। यह पुस्तक गणित की तकनीकी चर्चा नहीं करती, बल्कि यह बताती है कि भारतीय सभ्यता में अंक केवल गणना के साधन नहीं, बल्कि गहरे सांस्कृतिक अर्थों और जीवन-दृष्टि के वाहक रहे हैं।
भारतीय परंपरा में शून्य, एक, तीन, पाँच, सात, नौ, दस, बारह, चौदह, अठारह, चौरासी और एक सौ आठ जैसे अंकों का विशेष महत्व रहा है। शिव मृदुल इन अंकों से जुड़े धार्मिक विश्वासों, पुराणों, लोककथाओं, अनुष्ठानों और दार्शनिक अवधारणाओं का रोचक विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं।
उदाहरण के लिए—
लेखक यह भी स्पष्ट करते हैं कि किस प्रकार लोकगीतों, मुहावरों, कहावतों, त्योहारों और सामाजिक रीति-रिवाजों में अंकों का प्रयोग केवल संयोग नहीं, बल्कि सामूहिक सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा है।
"अंकों का सांस्कृतिक वैभव" संस्कृति-अध्ययन, लोक-साहित्य और भारतीय ज्ञान-परंपरा को समझने की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक है। शिव मृदुल की भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और शोधपरक है। वे गंभीर विषय को भी रोचक उदाहरणों और संदर्भों के माध्यम से पाठकों के सामने रखते हैं।
यह पुस्तक उन पाठकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो भारतीय संस्कृति, लोकजीवन, प्रतीक-विज्ञान, धर्म-दर्शन और सांस्कृतिक अध्ययन में रुचि रखते हैं।
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