ARANYAK

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  • Format: Paper Back
  • Publish Years: 2026
  • Total page: 216
  • Language: HINDI

"आरण्यक" भारतीय साहित्य की उन कालजयी कृतियों में से एक है, जो मनुष्य और प्रकृति के संबंधों को अद्भुत संवेदनशीलता और दार्शनिक गहराई के साथ प्रस्तुत करती है। प्रसिद्ध बांग्ला साहित्यकार विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय द्वारा रचित यह उपन्यास मूलतः 1939 में प्रकाशित हुआ था और आज भी पर्यावरणीय चेतना तथा मानवीय संवेदनाओं के सबसे महत्त्वपूर्ण साहित्यिक दस्तावेज़ों में गिना जाता है।

उपन्यास का नायक सत्यचरण, शहर में शिक्षित एक युवा है, जिसे बिहार के पूर्णिया क्षेत्र के एक विशाल जमींदारी वन-क्षेत्र का प्रबंधक नियुक्त किया जाता है। प्रारम्भ में जंगल का एकांत उसे भयभीत करता है, लेकिन धीरे-धीरे वह जंगल, वहाँ के पेड़-पौधों, आदिवासी समुदायों, गरीब किसानों और प्रकृति की विराटता से गहरा जुड़ाव महसूस करने लगता है।

विडंबना यह है कि उसका दायित्व उसी जंगल को काटकर खेती योग्य भूमि में बदलना है। एक ओर प्रकृति के प्रति प्रेम और दूसरी ओर विकास एवं प्रशासनिक जिम्मेदारी—इन्हीं दो ध्रुवों के बीच सत्यचरण का भीतरी संघर्ष इस उपन्यास का मूल स्वर बन जाता है।

"आरण्यक" केवल एक वन-गाथा नहीं, बल्कि विकास, विस्थापन, आदिवासी जीवन, पर्यावरण विनाश और मनुष्य के अपराध-बोध की मार्मिक कथा है। यह उपन्यास पाठकों को यह सोचने के लिए विवश करता है कि सभ्यता की कीमत कहीं प्रकृति के विनाश और मानवीय मूल्यों के क्षरण के रूप में तो नहीं चुकाई जा रही।

यह कृति प्रकृति-प्रेमियों, साहित्य के गंभीर पाठकों, पर्यावरण अध्ययन के विद्यार्थियों तथा भारतीय क्लासिक उपन्यासों में रुचि रखने वाले सभी पाठकों के लिए अनिवार्य रूप से पठनीय है।

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