‘बूढ़ा चाँद’ : संवेदना, विस्मय और आत्मसंवाद का कथासंसार
‘बूढ़ा चाँद’ कहानी-संग्रह में संकलित 14 कहानियाँ अपने भीतर एक विशिष्ट किस्म की जिज्ञासा, आत्मीयता और अनुभव-संपन्नता को संजोए हुए हैं। इन कहानियों की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि वे किसी पूर्वनिर्धारित बौद्धिक ढाँचे या सुसंगठित ‘नज़रिये’ से दुनिया को मापने का आग्रह नहीं करतीं; बल्कि एक सहज, निष्कलुष और अनगढ़ संवेदना के सहारे जीवन के विविध आयामों को स्पर्श करती हैं।
शर्मिला जालान की लेखनी में एक बालिका-सुलभ कौतूहल और विस्मय का भाव निरंतर सक्रिय दिखाई देता है। यही कारण है कि उनकी कहानियों में लेखिका एक साथ बालिका, किशोरी और युवती इन तीनों अवस्थाओं में उपस्थित रहती हैं। यह बहुस्तरीय उपस्थिति उनकी कथा-दृष्टि को एक विशिष्ट गहराई और तरलता प्रदान करती है।
संग्रह की शीर्षक और सबसे विस्तृत कहानी ‘बूढ़ा चाँद’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसमें एक बालिका रवीन्द्रनाथ ठाकुर को अपना अंतरंग मित्र मानकर उनसे निरंतर संवाद करती रहती है। यह संवाद केवल कल्पना का खेल नहीं, बल्कि एक संवेदनशील मन द्वारा अपने भीतरी संसार और बाहरी यथार्थ के बीच सेतु रचने का सृजनात्मक प्रयास है। इस दृष्टि से यह कहानी आत्मसंवाद, कल्पना और यथार्थ के अद्भुत संलयन का उदाहरण बन जाती है।
शर्मिला की अधिकांश कहानियाँ जीवन की छोटी-छोटी, लगभग अनदेखी रह जाने वाली घटनाओं से निर्मित हैं, जिनमें मानवीय अनुभवों की सूक्ष्म छवियाँ उभरती हैं। ‘मॉल मून’ और ‘कार्नसूप’ जैसी कहानियाँ समकालीन महानगरीय जीवन में विकसित हो रही ‘मॉल संस्कृति’ की ट्रैजिकॉमिक विडंबनाओं को बड़ी संवेदनशीलता और व्यंग्यात्मक तीखेपन के साथ प्रस्तुत करती हैं।
कुल मिलाकर, ‘बूढ़ा चाँद’ एक ऐसा कथा-संग्रह है, जो अपने वैविध्य, संवेदनात्मक विस्तार और कल्पनाशीलता के कारण पाठकों को न केवल आकर्षित करता है, बल्कि उन्हें भीतर तक स्पर्श भी करता है। यह संग्रह पाठकीय अनुभव को एक नई दृष्टि और गहराई प्रदान करने में समर्थ प्रतीत होता है।