‘शादी से पेशतर’ : प्रतीक्षा, विडंबना और स्त्री-अस्तित्व का अंतःसंसार
समकालीन समाज में विवाह, विशेषतः स्त्री के जीवन से जुड़ा
हुआ एक जटिल, बहुस्तरीय और लगभग त्रासद समस्या के रूप में उभरता जा रहा है। यह
जीवन का एक पड़ाव भर है, न कि अंतिम और परम लक्ष्य यह सहज बोध आज भी तथाकथित आधुनिक, शिक्षित युवतियों के भीतर पूरी तरह विकसित नहीं हो
पाता। कारण स्पष्ट है बाह्य परिवर्तन चाहे जितने हुए हों, सामाजिक संरचना अपने मूल आग्रहों में अभी भी लगभग
अपरिवर्तित ही बनी हुई है।
जींस पहने, छोटे बालों वाली, आत्मविश्वास से भरी प्रतीत होती युवती भले ही राहगीरों
को स्वतंत्र, चंचल या कभी-कभी ‘लड़का-सी’ लगने का भ्रम दे, किंतु उसके भीतर और उसके परिवार की चिंताओं में कोई
मूलभूत परिवर्तन नहीं आता। उनकी समस्त आकांक्षाएँ अंततः एक ‘उपयुक्त’ वर और ‘संतोषजनक’ परिवार की खोज तक सिमट जाती हैं। यह खोज धीरे-धीरे एक
अंतहीन, थकाऊ और कभी-कभी प्राणघातक प्रतीक्षा में बदल जाती है ऐसी प्रतीक्षा, जो असफलताओं के साथ-साथ भय, असुरक्षा, अंधविश्वास, ज्योतिषीय उपायों और समय को भरने की विवशता को जन्म
देती रहती है। प्रश्न अनुत्तरित ही बना रहता है, विवाह से पूर्व यह लड़की अपने
जीवन को किस अर्थ से भर सके?
इसी संदर्भ में ‘शादी से पेशतर’ की अनेक युवतियों में से एक डेज़ी का कथन अत्यंत अर्थपूर्ण प्रतीत होता है “कुछ सोचो मत, बस करती चली जाओ।” परंतु यह ‘करते चले जाना’ क्या है? नए-नए कोर्सों की अंतहीन शृंखला ब्यूटीशियन, कंप्यूटर, इंटीरियर डेकोरेशन और न जाने कितने कौशलों की ओर आकृष्ट
होना। इस सक्रियता के पीछे कहीं न कहीं आत्मनिर्भरता का एक धुँधला-सा स्वप्न अवश्य
विद्यमान रहता है, किंतु विवाह को ही अंतिम ‘मोक्ष’ मान लेने की मानसिकता उसे ठोस रूप ग्रहण करने से रोक
देती है।
यह कृति पाठक को उस अंतःपुर के भीतर ले जाती है, जिसकी दरारों और विदीर्णताओं का अनुमान सामान्यतः संभव
नहीं हो पाता, क्योंकि दृष्टि प्रायः केवल दृश्य पर ही ठहर जाती है। ‘शादी से पेशतर’ एक कोलाज-शैली में रचित लघु उपन्यास है, जो प्रथम दृष्टि में सतही और सहज
प्रतीत होता है, किंतु गहराई से देखने पर यह उद्घाटित करता है कि सतह मात्र सतही
नहीं होती; उसके भीतर अनकही गहराइयाँ, अवसाद और डूब के अनेक स्तर विद्यमान रहते हैं।
लेखिका बिना किसी उपदेशात्मकता, बिना किसी गुरुगंभीर टिप्पणी के, विवाह की प्रतीक्षा में स्थगित जीवन जीती युवतियों से
इस प्रकार हमारा साक्षात्कार कराती हैं कि पाठक स्वयं उस असहजता और व्याकुलता का
अनुभव करने लगता है। वह हमें उन ‘लड़की देखने’ की औपचारिक, वस्तुगत दृष्टि से भरी बैठकों में शामिल कर देती हैं, जहाँ एक जीवंत व्यक्तित्व धीरे-धीरे एक ‘प्रस्ताव’ में बदलता चला जाता है और यहीं से उपन्यास की वास्तविक
त्रासदी पाठक के भीतर आकार लेने लगती है।
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