Shadi Se Peshtar by Sharmila Jalan

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  • Format: Hard Back
  • Publish Years: 2026
  • Total page: 144
  • Language: HINDI

शादी से पेशतर’ : प्रतीक्षाविडंबना और स्त्री-अस्तित्व का अंतःसंसार

समकालीन समाज में विवाह, विशेषतः स्त्री के जीवन से जुड़ा हुआ एक जटिलबहुस्तरीय और लगभग त्रासद समस्या के रूप में उभरता जा रहा है। यह जीवन का एक पड़ाव भर हैन कि अंतिम और परम लक्ष्य यह सहज बोध आज भी तथाकथित आधुनिकशिक्षित युवतियों के भीतर पूरी तरह विकसित नहीं हो पाता। कारण स्पष्ट है बाह्य परिवर्तन चाहे जितने हुए होंसामाजिक संरचना अपने मूल आग्रहों में अभी भी लगभग अपरिवर्तित ही बनी हुई है।

जींस पहनेछोटे बालों वालीआत्मविश्वास से भरी प्रतीत होती युवती भले ही राहगीरों को स्वतंत्रचंचल या कभी-कभी लड़का-सी’ लगने का भ्रम देकिंतु उसके भीतर और उसके परिवार की चिंताओं में कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं आता। उनकी समस्त आकांक्षाएँ अंततः एक उपयुक्त’ वर और संतोषजनक’ परिवार की खोज तक सिमट जाती हैं। यह खोज धीरे-धीरे एक अंतहीनथकाऊ और कभी-कभी प्राणघातक प्रतीक्षा में बदल जाती है ऐसी प्रतीक्षाजो असफलताओं के साथ-साथ भयअसुरक्षाअंधविश्वासज्योतिषीय उपायों और समय को भरने की विवशता को जन्म देती रहती है। प्रश्न अनुत्तरित ही बना रहता है, विवाह से पूर्व यह लड़की अपने जीवन को किस अर्थ से भर सके?

इसी संदर्भ में शादी से पेशतर की अनेक युवतियों में से एक डेज़ी का कथन अत्यंत अर्थपूर्ण प्रतीत होता है कुछ सोचो मतबस करती चली जाओ।” परंतु यह करते चले जाना’ क्या हैनए-नए कोर्सों की अंतहीन शृंखला ब्यूटीशियनकंप्यूटरइंटीरियर डेकोरेशन और न जाने कितने कौशलों की ओर आकृष्ट होना। इस सक्रियता के पीछे कहीं न कहीं आत्मनिर्भरता का एक धुँधला-सा स्वप्न अवश्य विद्यमान रहता हैकिंतु विवाह को ही अंतिम मोक्ष’ मान लेने की मानसिकता उसे ठोस रूप ग्रहण करने से रोक देती है।

यह कृति पाठक को उस अंतःपुर के भीतर ले जाती हैजिसकी दरारों और विदीर्णताओं का अनुमान सामान्यतः संभव नहीं हो पाताक्योंकि दृष्टि प्रायः केवल दृश्य पर ही ठहर जाती है। शादी से पेशतर एक कोलाज-शैली में रचित लघु उपन्यास है, जो प्रथम दृष्टि में सतही और सहज प्रतीत होता हैकिंतु गहराई से देखने पर यह उद्घाटित करता है कि सतह मात्र सतही नहीं होतीउसके भीतर अनकही गहराइयाँअवसाद और डूब के अनेक स्तर विद्यमान रहते हैं।

लेखिका बिना किसी उपदेशात्मकताबिना किसी गुरुगंभीर टिप्पणी केविवाह की प्रतीक्षा में स्थगित जीवन जीती युवतियों से इस प्रकार हमारा साक्षात्कार कराती हैं कि पाठक स्वयं उस असहजता और व्याकुलता का अनुभव करने लगता है। वह हमें उन लड़की देखने’ की औपचारिकवस्तुगत दृष्टि से भरी बैठकों में शामिल कर देती हैंजहाँ एक जीवंत व्यक्तित्व धीरे-धीरे एक प्रस्ताव’ में बदलता चला जाता है और यहीं से उपन्यास की वास्तविक त्रासदी पाठक के भीतर आकार लेने लगती है।

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Leslie Alexander
February 10, 2024 at 2:37 pm

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