शर्मिला जालान
7 जुलाई, 1973 को जन्मी शर्मिला जालान समकालीन हिंदी कथा-साहित्य की एक सशक्त और संवेदनशील हस्ताक्षर हैं। उनकी रचनाशीलता में आधुनिक जीवन के अंतर्द्वंद्व, स्त्री-अनुभव की सूक्ष्म परतें और संबंधों की जटिल संरचनाएँ गहन कलात्मकता के साथ अभिव्यक्त होती हैं।
उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. तथा एम.फिल. की उपाधि प्राप्त की। उनका शोध-विषय ‘कृष्णा सोबती के उपन्यासों में परिवार की अवधारणा’ रहा, जो उनके साहित्यिक दृष्टिकोण और आलोचनात्मक संवेदना की गंभीरता को रेखांकित करता है।
उनकी प्रमुख कृतियों में उपन्यास ‘शादी से पेशतर’ तथा कहानी-संग्रह ‘बूढ़ा चाँद’, ‘राग-विराग और अन्य कहानियाँ’ और ‘माँ, मार्च और मृत्यु’ शामिल हैं। उनके कहानी-संग्रह ‘बूढ़ा चाँद’ का पटना और मुंबई सहित अनेक नगरों में सफल मंचन भी हुआ है, जो उनकी कहानियों की जीवंतता और नाटकीयता का प्रमाण है।
साहित्यिक सक्रियता के स्तर पर उन्होंने भारत भवन, भोपाल द्वारा आयोजित ‘युवा-5’ (2017), रज़ा फ़ाउंडेशन के ‘युवा’ (2018) तथा आजतक साहित्य उत्सव (2019) में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।
सम्मानों की दृष्टि से उन्हें भारतीय भाषा परिषद युवा पुरस्कार (2004), कन्हैयालाल सेठिया सारस्वत सम्मान (2017) तथा कृष्ण बलदेव वैद फेलोशिप (2019) से अलंकृत किया जा चुका है, जो उनके साहित्यिक अवदान की व्यापक स्वीकृति को दर्शाता है।
वर्तमान में वे कलकत्ता में अध्यापन कार्य से संबद्ध हैं और अपने पति अमित जालान तथा पुत्र शशांक जालान के साथ निवास करती हैं।
उनकी लेखनी समकालीन हिंदी साहित्य में मानवीय संवेदनाओं की सूक्ष्म पड़ताल और वैचारिक गहराई के लिए विशेष रूप से पहचानी जाती है।
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