"शहीदों की छाया में" भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अमर सेनानी और काकोरी काण्ड के क्रांतिकारी राम कृष्ण खत्री की आत्मकथात्मक संस्मरणात्मक कृति है। यह पुस्तक केवल एक व्यक्ति की जीवन-कथा नहीं, बल्कि उन अनगिनत युवाओं के अदम्य साहस, त्याग और क्रांतिकारी संकल्प का जीवंत दस्तावेज़ है, जिन्होंने भारत की आज़ादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
राम कृष्ण खत्री स्वयं हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) के सक्रिय सदस्य थे और उन्होंने क्रांतिकारी आंदोलन को मध्य भारत तथा महाराष्ट्र में संगठित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। काकोरी षड्यंत्र प्रकरण में उन्हें गिरफ्तार किया गया और दस वर्षों का कारावास भुगतना पड़ा। इसलिए इस पुस्तक का प्रत्येक प्रसंग किसी बाहरी पर्यवेक्षक का नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रत्यक्षदर्शी सेनानी का प्रमाणिक अनुभव है।
इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता इसकी स्पष्टवादिता और प्रामाणिकता है। लेखक बिना किसी आडंबर के क्रांतिकारियों के संगठनात्मक जीवन, जेल की यातनाओं, वैचारिक मतभेदों, साथियों के त्याग और स्वतंत्र भारत के सपनों का सजीव चित्रण करते हैं। इसमें केवल प्रसिद्ध नामों का उल्लेख नहीं है, बल्कि उन गुमनाम शहीदों की स्मृतियाँ भी दर्ज हैं, जो इतिहास के मुख्य पृष्ठों में स्थान नहीं पा सके।
"शहीदों की छाया में" स्वतंत्रता आंदोलन के ज्ञात-अज्ञात पहलुओं को सामने लाती है और यह बताती है कि युवा क्रांतिकारी केवल अंग्रेज़ों को देश से निकालना ही नहीं चाहते थे, बल्कि एक न्यायपूर्ण, समानतामूलक और स्वाभिमानी भारत का निर्माण भी उनका स्वप्न था।
यह पुस्तक इतिहास-प्रेमियों, शोधार्थियों, क्रांतिकारी साहित्य के पाठकों और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को प्रत्यक्षदर्शी की दृष्टि से समझने के इच्छुक प्रत्येक पाठक के लिए एक अनिवार्य पठनीय कृति है।
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