"सीढ़ियों पर धूप में" आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रमुख कवि, कथाकार और पत्रकार रघुवीर सहाय की आरंभिक और अत्यंत महत्वपूर्ण कृति है। यह पुस्तक केवल एक कविता-संग्रह नहीं, बल्कि कविताओं, कहानियों और लेखों का ऐसा समवेत संकलन है, जो रघुवीर सहाय की रचनात्मक चेतना के शुरुआती स्वरूप को पाठकों के सामने प्रस्तुत करता है।
इस कृति में एक ऐसे संवेदनशील रचनाकार की उपस्थिति दर्ज होती है, जो जीवन की साधारण घटनाओं, मनुष्य के आंतरिक द्वंद्व, सामाजिक विसंगतियों और बदलते समय की बेचैनियों को अत्यंत सहज, पारदर्शी और आत्मीय भाषा में अभिव्यक्त करता है। रघुवीर सहाय की दृष्टि आम आदमी के जीवन पर केंद्रित है। वे किसी ऊँचे आदर्शलोक में नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के अनुभवों, छोटे-छोटे सुख-दुःख और मानवीय संबंधों के बीच कविता की चमक खोजते हैं।
इस पुस्तक की भूमिका में अज्ञेय ने रघुवीर सहाय की भाषा और संवेदना की विशेष प्रशंसा करते हुए लिखा है कि वे "चट्टानों पर चढ़कर नाटकीय मुद्रा में बैठने के बजाय साधारण घरों की सीढ़ियों पर धूप में बैठकर प्रसन्न रहने वाले कवि हैं।" यही सहजता और आत्मीयता इस कृति की सबसे बड़ी शक्ति है।
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