"आहटें सुन रहा हूँ यादों की" हिंदी के प्रतिष्ठित कथाकार Kashinath Singh की एक महत्वपूर्ण संस्मरणात्मक कृति है। यह पुस्तक स्मृतियों, व्यक्तित्वों, साहित्यिक संसार और जीवनानुभवों का ऐसा जीवंत दस्तावेज़ है, जिसमें लेखक अपने समय, समाज और निकट संबंधों को आत्मीयता, बेबाकी और कथात्मक कौशल के साथ प्रस्तुत करते हैं।
काशीनाथ सिंह मूलतः कहानीकार और उपन्यासकार के रूप में प्रसिद्ध रहे हैं, इसलिए उनके संस्मरण भी साधारण स्मरण-लेख न होकर "स्मृति-कथाएँ" बन जाते हैं। इनमें यथार्थ और कथा-कौशल का ऐसा समन्वय है कि पाठक को घटनाएँ केवल जानकारी नहीं देतीं, बल्कि जीवंत अनुभव बनकर सामने आती हैं।
इस पुस्तक में 'याद हो कि न याद हो' के प्रथम संस्करण के बाद लिखे गए 18 संस्मरण संकलित हैं। पहले खंड के संस्मरण लेखक के निजी जीवन, परिवार, परिवेश और बनारसी अनुभवों से जुड़े हैं, जबकि दूसरे खंड में साहित्य और बौद्धिक जगत की अनेक महत्त्वपूर्ण विभूतियों पर केंद्रित संस्मरण शामिल हैं।
पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता इसकी आत्मीय भाषा और बनारसी ठाठ है। लेखक की शैली में हास्य, व्यंग्य, करुणा और बतकही का अद्भुत मेल दिखाई देता है। भोजपुरी और बनारसी संस्कृति की सहज उपस्थिति इन संस्मरणों को विशिष्ट रंग प्रदान करती है।
साहित्यिक दृष्टि से यह कृति केवल संस्मरण-संग्रह नहीं, बल्कि हिंदी साहित्यिक संसार, सांस्कृतिक स्मृतियों और मानवीय संबंधों का जीवंत अभिलेख है। यह पुस्तक पाठक को यह अनुभव कराती है कि वास्तविक देश के समानांतर स्मृतियों का भी एक स्वतंत्र और जीवंत संसार होता है।
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