हिंदी साहित्य की प्रख्यात कथाकार और उपन्यासकार मृदुला गर्ग की प्रतिनिधि एवं चर्चित कहानियों का एक महत्वपूर्ण संकलन है। यह संग्रह भारतीय समाज, स्त्री-अस्तित्व, मानवीय संबंधों, नैतिक द्वंद्वों, स्वतंत्र चेतना और आधुनिक जीवन की जटिलताओं को गहरी संवेदनशीलता तथा वैचारिक प्रखरता के साथ अभिव्यक्त करता है।
मृदुला गर्ग हिंदी कथा साहित्य की उन विशिष्ट रचनाकारों में हैं जिन्होंने अपने लेखन के माध्यम से स्थापित सामाजिक मान्यताओं, रूढ़ नैतिकताओं और परंपरागत सोच को चुनौती दी। उनकी कहानियाँ मनुष्य के बाहरी जीवन के साथ-साथ उसके अंतर्मन की उन परतों को भी उद्घाटित करती हैं, जहाँ इच्छाएँ, भय, अकेलापन, प्रेम, विद्रोह, असुरक्षाएँ और आत्मसंघर्ष निरंतर सक्रिय रहते हैं।
इस संग्रह में संकलित कहानियाँ केवल घटनाओं का वर्णन नहीं करतीं, बल्कि जीवन के जटिल प्रश्नों से संवाद स्थापित करती हैं। लेखिका अपने पात्रों के माध्यम से स्त्री और पुरुष संबंधों, पारिवारिक संरचनाओं, सामाजिक दबावों, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अस्तित्वगत संकटों का ऐसा चित्र प्रस्तुत करती हैं, जो पाठक को गहराई से सोचने के लिए विवश करता है। उनके पात्र किसी आदर्शवादी संसार के नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन की परिस्थितियों से जूझते हुए संवेदनशील मनुष्य हैं।
मृदुला गर्ग की लेखन-शैली की सबसे बड़ी विशेषता उनकी वैचारिक निर्भीकता और मनोवैज्ञानिक सूक्ष्मता है। वे जीवन के जटिल अनुभवों को सरल किंतु प्रभावशाली भाषा में व्यक्त करती हैं। उनकी कहानियों में भावुकता की अपेक्षा संवेदनात्मक गहराई, सामाजिक आलोचना की अपेक्षा मानवीय समझ और नारेबाजी की अपेक्षा जीवन-सत्य की खोज अधिक दिखाई देती है। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ समय के साथ और अधिक प्रासंगिक होती चली गई हैं।
इस संग्रह की कहानियाँ आधुनिक भारतीय समाज में बदलते मूल्यों, शहरी जीवन की विडंबनाओं, स्त्री की आत्मनिर्भरता, पारिवारिक संबंधों के बदलते स्वरूप और व्यक्ति की आंतरिक स्वतंत्रता के प्रश्नों को केंद्र में रखती हैं। लेखिका पाठकों को किसी निष्कर्ष तक पहुँचाने के बजाय उन्हें अपने भीतर झाँकने और जीवन को नए दृष्टिकोण से देखने के लिए प्रेरित करती हैं।
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