"अंधेर नगरी" हिंदी साहित्य के जनक और आधुनिक हिंदी नाटक के प्रवर्तक Bhartendu Harishchandra द्वारा रचित एक कालजयी व्यंग्यात्मक प्रहसन (नाटक) है। वर्ष 1881 में रचित यह कृति हिंदी रंगमंच और नाट्य साहित्य की सबसे लोकप्रिय रचनाओं में गिनी जाती है। इस नाटक में लेखक ने तत्कालीन शासन व्यवस्था, न्याय-प्रणाली, सामाजिक विसंगतियों और अंधी सत्ता पर तीखा व्यंग्य किया है।
"अंधेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी, टके सेर खाजा"—यह प्रसिद्ध उक्ति इसी नाटक से ली गई है। यह ऐसी व्यवस्था का प्रतीक है जहाँ योग्य और अयोग्य, न्याय और अन्याय, सत्य और असत्य में कोई अंतर नहीं रह जाता। नाटक की कथा एक ऐसे राज्य के इर्द-गिर्द घूमती है जहाँ शासन विवेकहीन है, न्याय हास्यास्पद है और राजा की मूर्खता पूरी व्यवस्था को अराजकता की ओर धकेल देती है।
कथा में एक महंत अपने दो शिष्यों को नगर में भेजता है। वहाँ सब वस्तुएँ एक ही मूल्य पर बिकती हैं। एक शिष्य इस लालच में पड़कर नगर में रुक जाता है, जबकि दूसरा गुरु के साथ लौट जाता है। आगे चलकर राज्य की मूर्खतापूर्ण न्याय-व्यवस्था के कारण निर्दोष लोगों को दंडित करने की घटनाएँ घटती हैं और अंततः चौपट राजा स्वयं अपने ही अन्यायपूर्ण निर्णयों का शिकार बन जाता है।
यह नाटक केवल हास्य और मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि सत्ता के दुरुपयोग, न्यायिक विडंबनाओं और सामाजिक अव्यवस्था पर गहरी चोट करता है। भारतेंदु ने व्यंग्य, हास्य और लोकभाषा के माध्यम से जनता को जागरूक करने का प्रयास किया है। इसीलिए यह कृति आज भी उतनी ही प्रासंगिक प्रतीत होती है जितनी अपने समय में थी।
साहित्यिक दृष्टि से "अंधेर नगरी" हिंदी का सर्वश्रेष्ठ व्यंग्य-प्रहसन माना जाता है। इसकी भाषा सरल, संवाद प्रभावशाली और कथानक अत्यंत रोचक है। यह कृति भारतीय लोकतंत्र, शासन और न्याय व्यवस्था पर विचार करने के लिए आज भी प्रेरित करती है।
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