"ब्रह्मराक्षस" हिंदी के महत्वपूर्ण दलित साहित्यकार सूरजपाल चौहान का एक चर्चित और विचारोत्तेजक कहानी-संग्रह है। यह कृति भारतीय समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव, सामाजिक असमानता, ब्राह्मणवादी वर्चस्व, मानवीय अपमान और दलित अस्मिता के संघर्ष को अत्यंत तीखे और यथार्थवादी ढंग से प्रस्तुत करती है।
सूरजपाल चौहान दलित साहित्य के उन लेखकों में हैं जिन्होंने दलित जीवन की पीड़ा को बाहर से नहीं, बल्कि उसे स्वयं जीकर अभिव्यक्त किया है। उनकी कहानियाँ किसी दया या सहानुभूति की याचना नहीं करतीं, बल्कि अन्यायपूर्ण सामाजिक संरचनाओं के विरुद्ध प्रतिरोध का स्वर बनकर सामने आती हैं।
इस संग्रह की शीर्षक कहानी "ब्रह्मराक्षस" एक शक्तिशाली प्रतीक के रूप में उभरती है। भारतीय मिथकों में ब्रह्मराक्षस उस ब्राह्मण को कहा गया है, जो अपने ज्ञान और शक्ति का दुरुपयोग करने के कारण शापित होकर राक्षस बन जाता है। सूरजपाल चौहान इस मिथकीय प्रतीक का प्रयोग आधुनिक समाज की उन अमानवीय प्रवृत्तियों को उजागर करने के लिए करते हैं, जो जाति, ऊँच-नीच और सामाजिक वर्चस्व के नाम पर मनुष्यता को निगलती रहती हैं।
संग्रह की कहानियाँ दलित समुदाय के रोज़मर्रा के जीवन, अपमान, संघर्ष, श्रम और आत्मसम्मान की लड़ाई को केंद्र में रखती हैं। लेखक दिखाते हैं कि संविधान द्वारा समानता का अधिकार दिए जाने के बावजूद सामाजिक व्यवहार में भेदभाव और छुआछूत की मानसिकता किस प्रकार आज भी मौजूद है। उनकी कहानियों के पात्र टूटते नहीं, बल्कि परिस्थितियों से लड़ते हुए अपनी पहचान और गरिमा की रक्षा का प्रयास करते हैं।
"ब्रह्मराक्षस" दलित चेतना का एक सशक्त दस्तावेज़ है। सूरजपाल चौहान की भाषा सीधी, तीखी और बिना किसी अलंकरण के यथार्थ को सामने रखती है। वे पाठक को असुविधाजनक प्रश्नों से सामना कराते हैं और यह सोचने के लिए विवश करते हैं कि सभ्य कहलाने वाले समाज के भीतर कितनी गहरी असमानताएँ छिपी हुई हैं।
यह पुस्तक केवल दलित जीवन का चित्रण नहीं करती, बल्कि मानवीय गरिमा, सामाजिक न्याय और समानता की आकांक्षा का भी साहित्यिक घोषणापत्र बन जाती है।
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