"चन्द्रमुखी का देवदास" वरिष्ठ साहित्यकार शरद पगारे का एक संवेदनशील और मार्मिक कहानी-संग्रह है, जो छोटे शहरों के उन जीवंत चरित्रों को साहित्यिक रूप देता है, जिन्हें समाज अक्सर अनदेखा कर देता है। यह कृति जीवन के साधारण दिखने वाले लोगों की असाधारण मानवीय संवेदनाओं, संघर्षों, प्रेम, साहस और आत्मीयता का दस्तावेज़ है।
इस पुस्तक का शीर्षक प्रसिद्ध उपन्यास "देवदास" की स्मृति अवश्य जगाता है, किंतु यह उसकी पुनर्कथा नहीं है। बल्कि लेखक ने मध्य प्रदेश के कस्बाई शहर खण्डवा के वास्तविक जीवन से प्रेरित पात्रों और घटनाओं को कल्पना के रंगों से सजाकर ऐसी कहानियाँ रची हैं, जिनमें जीवन की सच्चाई और साहित्य का सौंदर्य एकाकार हो जाता है।
इन कहानियों में चन्द्रमुखी शान्ता, बहादुर प्रमोद, पारू जीजी, जर्मन, बाला दादा, ताराचन्द पहलवान, अवध भैया, विम्मी और शेरू दादा जैसे पात्र अपने पूरे मानवीय ताप के साथ उपस्थित होते हैं। वे प्रेम करते हैं, संघर्ष करते हैं, रिश्तों को निभाते हैं और अपने समय की सामाजिक जटिलताओं का सामना करते हैं। लेखक ने उनकी चारित्रिक विशेषताओं, संवेदनाओं और जीवन-दृष्टि को अत्यंत आत्मीयता के साथ चित्रित किया है।
शरद पगारे की भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण और भावपूर्ण है। वे लोकजीवन की छोटी-छोटी घटनाओं में मानवीय करुणा, हास्य और जीवन-दर्शन की खोज करते हैं। उनकी लेखनी पाठक को यह अनुभव कराती है कि हर कस्बे, हर गली और हर चेहरे के पीछे एक अनकही कहानी छिपी होती है।
"आईना कभी झूठ नहीं बोलता; जीवन की सच्चाइयाँ जब साहित्य के आईने में उतरती हैं, तो वे मनुष्य के वास्तविक चेहरे से हमारा परिचय कराती हैं।"
"चन्द्रमुखी का देवदास" केवल कहानियों का संग्रह नहीं, बल्कि बदलते समय में मनुष्य की संवेदनशीलता, स्मृतियों और संबंधों को बचाए रखने का एक साहित्यिक प्रयास है। यह पाठकों को छोटे शहरों की उस दुनिया में ले जाती है, जहाँ साधारण लोग ही असाधारण जीवन-कथाओं के नायक बन जाते हैं।
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