"ध्रुवस्वामिनी" हिंदी साहित्य के महान नाटककार Jaishankar Prasad की अंतिम और सर्वश्रेष्ठ नाट्य-कृतियों में से एक है। यह एक ऐतिहासिक नाटक है, जिसका कथानक गुप्तकालीन इतिहास पर आधारित है। नाटक में इतिहास, प्रेम, राजनीति, नारी-अस्मिता और सामाजिक न्याय के प्रश्नों का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण किया गया है।
नाटक की कथा गुप्त सम्राट रामगुप्त, उनके छोटे भाई चंद्रगुप्त तथा रानी ध्रुवस्वामिनी के जीवन से जुड़ी ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित है। ध्रुवस्वामिनी एक स्वाभिमानी, बुद्धिमती और साहसी नारी है, जो स्वयं को किसी की संपत्ति मानने से इंकार करती है। जब सत्ता, स्वार्थ और कायरता के कारण उसके सम्मान पर संकट आता है, तब वह अपने अस्तित्व और अधिकारों के लिए संघर्ष करती है।
इस नाटक की सबसे बड़ी विशेषता इसका नारी-मुक्ति और नारी-अस्मिता का स्वर है। जयशंकर प्रसाद ने ध्रुवस्वामिनी के माध्यम से स्त्री के आत्मसम्मान, स्वतंत्र निर्णय और पुनर्विवाह के अधिकार जैसे विषयों को अत्यंत साहसिक ढंग से प्रस्तुत किया है। उस समय जब भारतीय समाज में स्त्री-अधिकारों पर खुली चर्चा भी दुर्लभ थी, प्रसाद ने इस नाटक में स्त्री की स्वतंत्र चेतना को स्वर दिया।
साहित्यिक दृष्टि से यह नाटक इतिहास और आधुनिक चेतना का अद्भुत समन्वय है। इसमें राष्ट्रगौरव, राजनीतिक दूरदर्शिता, प्रेम, त्याग और सामाजिक परिवर्तन की भावना समान रूप से उपस्थित है। प्रसाद की काव्यमय भाषा, प्रभावशाली संवाद और सशक्त चरित्र-चित्रण इस कृति को हिंदी नाट्य-साहित्य की अमूल्य धरोहर बनाते हैं।
"ध्रुवस्वामिनी" केवल एक ऐतिहासिक नाटक नहीं, बल्कि स्त्री-अधिकार, आत्मसम्मान और मानवीय स्वतंत्रता का घोष है। यह कृति आज भी अपनी वैचारिक प्रासंगिकता और साहित्यिक गरिमा के कारण हिंदी साहित्य की श्रेष्ठ नाट्य-कृतियों में गिनी जाती है।
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