दो गज की दूरी सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार ममता कालिया का एक महत्वपूर्ण कथा-संग्रह है, जो हमारे समय की सामाजिक, पारिवारिक और मानवीय विडंबनाओं को बेहद सहज, तीक्ष्ण और संवेदनशील दृष्टि से प्रस्तुत करता है। विशेष रूप से महामारी के दौर में बदलते रिश्तों, भय, अकेलेपन, सामाजिक दूरी और मानवीय निकटता के नए अर्थों को यह पुस्तक गहराई से रेखांकित करती है।
ममता कालिया अपनी विशिष्ट शैली में आम आदमी के जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं के माध्यम से बड़े सामाजिक प्रश्नों को उठाती हैं। इस संग्रह की कहानियाँ मध्यवर्गीय जीवन की उलझनों, स्त्री-अनुभवों, पीढ़ियों के बदलते संबंधों, सामाजिक असमानताओं और मनुष्य की जिजीविषा को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त करती हैं। उनकी भाषा सरल, व्यंग्यपूर्ण और आत्मीय है, जो पाठकों को सीधे अपने अनुभवों से जोड़ देती है।
'दो गज की दूरी' केवल महामारी के समय का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि बदलते समाज और मनुष्य की आंतरिक दुनिया को समझने का एक संवेदनशील प्रयास है। यह पुस्तक हमें याद दिलाती है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, मानवीय संवेदना, सहानुभूति और संबंधों की ऊष्मा ही जीवन को अर्थ प्रदान करती है।
यह कृति समकालीन हिंदी कथा-साहित्य, स्त्री लेखन और सामाजिक यथार्थ में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए एक संग्रहणीय पुस्तक है।
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