"Don't Be Emotional" वरिष्ठ कथाकार महेश दर्पण का एक महत्त्वपूर्ण कहानी-संग्रह है, जिसमें समकालीन भारतीय समाज के आम आदमी के संघर्ष, रिश्तों की बदलती प्रकृति और मानवीय संवेदनाओं के जटिल संसार को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
महेश दर्पण अपने समय के प्रतिनिधि कथाकार माने जाते हैं। उनकी कहानियाँ जीवन के छोटे-छोटे अनुभवों से बड़े सामाजिक सत्य उजागर करती हैं। इस संग्रह में वे ऐसे पात्रों को सामने लाते हैं जो बदलते सामाजिक परिवेश, आर्थिक दबावों, पारिवारिक विघटन और भावनात्मक उलझनों के बीच अपनी पहचान और मानवीय गरिमा बचाए रखने का संघर्ष कर रहे हैं।
पुस्तक का शीर्षक "Don't Be Emotional" अपने आप में एक विडंबना है। आज के व्यावहारिक और प्रतिस्पर्धी दौर में मनुष्य को बार-बार भावनाओं से दूर रहने की सलाह दी जाती है, लेकिन ये कहानियाँ बताती हैं कि संवेदनशीलता ही मनुष्य को मनुष्य बनाती है। भावुकता और विवेक, संबंध और स्वार्थ, करुणा और कठोरता के बीच चलने वाला यह द्वंद्व इस संग्रह का मूल स्वर है।
महेश दर्पण की भाषा सहज, संवादधर्मी और पाठक को बाँधे रखने वाली है। उनकी कहानियाँ केवल मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि पाठकों को अपने समय, समाज और स्वयं के भीतर झाँकने का अवसर भी प्रदान करती हैं।
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