"ड्योढ़ी" प्रसिद्ध कवि, गीतकार, कथाकार और फिल्मकार गुलज़ार का एक अत्यंत संवेदनशील और बहुआयामी कहानी-संग्रह है। यह पुस्तक जीवन के उन छोटे-छोटे अनुभवों, स्मृतियों और मानवीय रिश्तों को शब्द देती है, जिन्हें हम अक्सर रोज़मर्रा की भागदौड़ में अनदेखा कर देते हैं। इसमें संकलित कहानियाँ मनुष्य की खुशियों, दुखों, बिछोह, दोस्ती, प्रेम, विभाजन, हिंसा और उम्मीद के अनेक रंगों को अपने भीतर समेटे हुए हैं।
गुलज़ार स्वयं लिखते हैं कि "कहानियों के कई रुख़ होते हैं।" वे किसी एक सत्य की ओर नहीं, बल्कि जीवन की अनेक पगडंडियों की ओर ले जाती हैं। यही कारण है कि ड्योढ़ी की प्रत्येक कहानी अपने भीतर एक अलग संसार, अलग अनुभव और अलग संवेदना लेकर आती है।
इस संग्रह में भारत-पाक विभाजन की टीस, महानगर मुंबई की गलियों और फुटपाथों का जीवन, दंगों और सीमाओं के बीच बँटे लोगों का दर्द, रिश्तों की नाजुकता, बचपन की स्मृतियाँ और बुढ़ापे का अकेलापन—सब कुछ अत्यंत आत्मीयता और गहरी मानवीय दृष्टि के साथ चित्रित हुआ है।
गुलज़ार की भाषा उनकी कविता की तरह सरल, मर्मस्पर्शी और चित्रात्मक है। वे मामूली घटनाओं में असाधारण अर्थ खोज लेते हैं। उनकी कहानियाँ पाठक को केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि महसूस करने के लिए आमंत्रित करती हैं। उनमें शायर की संवेदना और कथाकार की दृष्टि का अद्भुत संगम दिखाई देता है।
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