"माँ, मार्च और मृत्यु" समकालीन हिन्दी कथा-साहित्य की चर्चित लेखिका शर्मिला जालान का संवेदनशील और विचारोत्तेजक कहानी-संग्रह है। यह संग्रह मनुष्य के भीतर घटित होने वाली जटिल भावनाओं, रिश्तों की परतों और जीवन-मृत्यु के शाश्वत प्रश्नों को गहरी मानवीय दृष्टि के साथ प्रस्तुत करता है।
इन कहानियों में जीवन के साधारण अनुभव असाधारण अर्थ ग्रहण कर लेते हैं। माँ के स्नेह, स्मृतियों की पीड़ा, मृत्यु की अनिवार्यता और बदलते सामाजिक परिवेश के बीच मनुष्य की आंतरिक यात्रा को लेखिका अत्यंत सूक्ष्मता से अभिव्यक्त करती हैं। उनकी कहानियाँ किसी निष्कर्ष तक पहुँचने की जल्दबाज़ी नहीं करतीं, बल्कि पाठकों को सोचने, महसूस करने और अपने अनुभवों के साथ संवाद करने का अवसर देती हैं।
प्रख्यात आलोचक के शब्दों में, शर्मिला जालान की दृष्टि "संकीर्ण, अपाहिज और विभाजित नहीं है"। वे औसत अनुभवों को भी खुले मन और पूर्वाग्रह-मुक्त संवेदना के साथ देखने का प्रयास करती हैं। उनकी कहानियाँ न तो पात्रों का सरलीकरण करती हैं और न ही मानवीय परिस्थितियों का। वे यह स्वीकार करती हैं कि अच्छाई के भीतर बुराई और बुराई के भीतर अच्छाई का अंश छिपा हो सकता है।
"माँ, मार्च और मृत्यु" उन पाठकों के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है जो मनोवैज्ञानिक गहराई, स्त्री-संवेदना और समकालीन हिन्दी कहानी की गंभीर रचनात्मकता को पढ़ना पसंद करते हैं।
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