'पूरबी बयार' प्रख्यात कथाकार संजीव का एक महत्वपूर्ण कहानी-संग्रह है, जिसमें भारतीय समाज, विशेषकर ग्रामीण और कस्बाई जीवन की जटिलताओं, संघर्षों और बदलते मानवीय संबंधों का अत्यंत सजीव चित्रण किया गया है। संजीव अपने यथार्थवादी लेखन और गहरी सामाजिक दृष्टि के लिए जाने जाते हैं, और यह संग्रह उनकी उसी रचनात्मक प्रतिबद्धता का उत्कृष्ट उदाहरण है।
इस संग्रह की कहानियाँ आम जनजीवन के उन पक्षों को सामने लाती हैं जो अक्सर साहित्य और समाज की मुख्यधारा में उपेक्षित रह जाते हैं। किसान, मजदूर, निम्न एवं मध्यवर्गीय परिवार, स्त्रियाँ और हाशिए पर खड़े लोग इन कथाओं के केंद्र में हैं। लेखक उनकी पीड़ा, संघर्ष, सपनों और जिजीविषा को अत्यंत संवेदनशीलता और प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करते हैं।
'पूरबी बयार' की भाषा सहज, जीवंत और लोकजीवन की मिट्टी से जुड़ी हुई है। इसमें पूर्वांचल की सांस्कृतिक सुगंध, लोक-चेतना और सामाजिक यथार्थ का प्रभावशाली समन्वय दिखाई देता है। यह संग्रह पाठक को न केवल भावनात्मक रूप से प्रभावित करता है, बल्कि अपने समय और समाज के बारे में गंभीरता से सोचने के लिए भी प्रेरित करता है।
यह पुस्तक समकालीन हिंदी कथा-साहित्य, सामाजिक यथार्थ और ग्रामीण जीवन पर आधारित साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए एक संग्रहणीय कृति है।
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