"विलोपन" वरिष्ठ कथाकार शैलेन्द्र सागर का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण कहानी-संग्रह है, जो हमारे समय में धीरे-धीरे लुप्त होती मानवीय संवेदनाओं, रिश्तों और जीवन-मूल्यों का मार्मिक दस्तावेज़ है। यह संग्रह उस बदलती दुनिया की कहानी कहता है जहाँ तेज़ रफ्तार जीवन, करियर की अंधी दौड़, निर्मम प्रतिस्पर्धा, उपभोक्तावाद और अनियंत्रित महत्वाकांक्षाएँ मनुष्य को उसके मूल मानवीय स्वरूप से दूर ले जा रही हैं।
शैलेन्द्र सागर की कहानियाँ उस "विलोपन" को दर्ज करती हैं जो हमारी रोज़मर्रा की व्यस्तताओं के बीच चुपचाप घटित हो रहा है—रिश्तों का विलोपन, आत्मीयता का विलोपन, करुणा का विलोपन और मनुष्य के भीतर बसे संवेदनशील व्यक्ति का विलोपन। लेखक अपने पात्रों के माध्यम से आधुनिक जीवन की विडंबनाओं, अकेलेपन और टूटते सामाजिक ताने-बाने को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करते हैं।
इन कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी गहरी मानवीय दृष्टि और सामाजिक सजगता है। शैलेन्द्र सागर बिना किसी शोर-शराबे के पाठकों को यह सोचने के लिए प्रेरित करते हैं कि विकास और उपलब्धियों की इस दौड़ में हम क्या-क्या खोते जा रहे हैं। उनकी भाषा सहज, परिपक्व और संवादधर्मी है, जो पाठक को सीधे कहानी के भीतर ले जाती है।
"विलोपन" समकालीन हिन्दी कहानी-साहित्य के गंभीर पाठकों, शोधार्थियों और सामाजिक यथार्थ में रुचि रखने वाले साहित्य-प्रेमियों के लिए एक संग्रहणीय कृति है।
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