ASTHAN

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  • Format: Paper Back
  • Publish Years: 2026
  • Total page: 223
  • Language: HINDI

"अस्थान" वरिष्ठ कथाकार राजनारायण बोहरे का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण और विचारोत्तेजक सामाजिक-राजनीतिक उपन्यास है। यह उपन्यास धर्म, आस्था, बाज़ार, अंधविश्वास और आधुनिक "बाबा संस्कृति" के जटिल गठजोड़ की गहरी पड़ताल करता है। लेखक ने साधु-संतों की दुनिया के बाहरी आडंबर के पीछे छिपी वास्तविकताओं को बेबाकी से उजागर किया है।

उपन्यास का "अस्थान" केवल किसी आश्रम या धार्मिक स्थल का नाम नहीं, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था का प्रतीक है जहाँ आस्था का व्यापार, धर्म का प्रदर्शन और सत्ता का खेल एक-दूसरे में उलझ जाते हैं। कथा का केंद्र ठडेसुरी बाबा, उनकी सत्संग मंडली और उनके इर्द-गिर्द निर्मित प्रभावशाली धार्मिक संसार है।

उपन्यास का प्रमुख पात्र धरनीधर एक पढ़ा-लिखा युवक है, जो जीवन की विडंबनाओं और परिस्थितियों से जूझते-जूझते ऐसी राह पर पहुँच जाता है जहाँ उसे झूठे वेश और आडंबर का सहारा लेना पड़ता है। लेखक प्रश्न उठाते हैं कि आखिर ऐसी कौन-सी सामाजिक परिस्थितियाँ हैं, जो एक सामान्य युवक को "बाबा" बनने की ओर धकेल देती हैं? दूसरी ओर, ओमदास जैसे पात्रों के माध्यम से वैराग्य, तपस्या और सच्चे आध्यात्मिक जीवन की कठिनाइयों को भी चित्रित किया गया है।

राजनारायण बोहरे ने दिखाया है कि आज के समय में धर्म केवल श्रद्धा का विषय नहीं रह गया है; वह कॉर्पोरेट संस्कृति, मीडिया, राजनीति और उपभोक्तावाद से गहरे रूप में जुड़ चुका है। समाज तथाकथित चमत्कारी बाबाओं की ओर आकर्षित होता है और धीरे-धीरे विवेक की जगह अंधानुकरण ले लेता है। उपन्यास बार-बार यह सवाल उठाता है कि क्या हम वास्तव में आस्थावान हैं, या हमें योजनाबद्ध ढंग से आस्थावान बनाया जा रहा है?

कृति का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष ब्रज और बुंदेलखंड के लोकजीवन का चित्रण भी है। लोकगीत, त्योहार, सत्संग और स्त्रियों की सहभागिता के माध्यम से लेखक यह दिखाते हैं कि धार्मिक संस्थाओं को लोकप्रिय बनाने में महिलाओं की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होती है।

साहित्यिक दृष्टि से

"अस्थान" समकालीन हिंदी साहित्य का एक साहसिक और प्रासंगिक उपन्यास है। यह किसी धर्म विशेष की आलोचना नहीं करता, बल्कि आस्था के नाम पर पनप रहे पाखंड, अंधविश्वास और शोषण की परतें खोलता है। राजनारायण बोहरे की भाषा लोक-संवेदना, शोधपरक दृष्टि और कथात्मक प्रवाह से समृद्ध है। यह उपन्यास पाठक को केवल कहानी नहीं सुनाता, बल्कि उसे अपने समय के कटु सत्यों से सामना करने के लिए विवश करता है।

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