गंगा रतन बिदेसी’ भोजपुरी साहित्य का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक-सामाजिक उपन्यास है, जो लगभग एक शताब्दी में फैली चार पीढ़ियों की संघर्षगाथा को प्रस्तुत करता है। यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि उन लाखों भारतीयों की सामूहिक पीड़ा, विस्थापन, श्रम, शोषण और जीवटता का दस्तावेज है जिन्हें ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान गिरमिटिया मजदूर बनाकर विदेशों में भेजा गया था।
उपन्यास की कथा उन्नीसवीं शताब्दी के उस दौर से आरम्भ होती है जब करों और औपनिवेशिक अत्याचारों से त्रस्त एक किसान परिवार का मुखिया मूनेसर अपनी भूमि और घर-बार छोड़कर दक्षिण अफ्रीका के नटाल में गिरमिटिया मजदूर बनने को विवश हो जाता है। इसके बाद कहानी उसकी आगामी पीढ़ियों—रतन दुलारी और गंगा रतन बिदेसी—के जीवन-संघर्षों के माध्यम से भारत, दक्षिण अफ्रीका, बनारस, हावड़ा, कलकत्ता और दार्जिलिंग तक विस्तृत होती है।
रतन दुलारी महात्मा गांधी के सत्याग्रह आंदोलन से जुड़कर भारत लौटते हैं, किन्तु स्वतंत्रता के बाद भी उन्हें सामाजिक और आर्थिक असुरक्षाओं से मुक्ति नहीं मिलती। उनके पुत्र गंगा रतन बिदेसी को गरीबी, कर्ज, बीमारी और विस्थापन के दुष्चक्र से जूझना पड़ता है। जीविका की तलाश उसे हावड़ा की भट्टियों, कलकत्ता के बाजारों, सियालदह स्टेशन, दार्जिलिंग के चाय बागानों और अंततः प्रेसीडेंसी जेल तक पहुँचा देती है।
यह उपन्यास इतिहास और कथा का ऐसा संगम है जिसमें औपनिवेशिक शोषण, गिरमिटिया मजदूरों की त्रासदी, स्वतंत्रता आंदोलन, ग्रामीण जीवन, प्रवासन, पारिवारिक संबंध, प्रेम, संघर्ष और आशा के अनेक रंग दिखाई देते हैं। भोजपुरी भाषा की सहजता, लोक-संवेदना और भावनात्मक गहराई इस कृति को विशिष्ट बनाती है। अनेक समीक्षकों ने इसे आधुनिक भोजपुरी साहित्य की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना है।
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