कब तक पुकारूँ हिंदी साहित्य के प्रख्यात उपन्यासकार रांगेय राघव की सर्वाधिक चर्चित और महत्त्वपूर्ण कृतियों में से एक है। यह उपन्यास भारतीय समाज के उस उपेक्षित और हाशिए पर पड़े जीवन को केंद्र में लाता है, जिसे मुख्यधारा के इतिहास और साहित्य में प्रायः पर्याप्त स्थान नहीं मिला। अपने यथार्थवादी दृष्टिकोण, सामाजिक संवेदना और गहन मानवीय अंतर्दृष्टि के कारण यह कृति हिंदी के श्रेष्ठ आँचलिक उपन्यासों में गिनी जाती है।
उपन्यास का कथानक राजस्थान और उत्तर प्रदेश की सीमा से जुड़े ग्रामीण अंचल ‘बैर’ के परिवेश में विकसित होता है। यह क्षेत्र अपनी विशिष्ट लोक-संस्कृति, सामाजिक विषमताओं और संघर्षपूर्ण जीवन-स्थितियों के लिए जाना जाता है। रांगेय राघव ने इस उपन्यास में विशेष रूप से करनट (नट) समुदाय के जीवन, उनकी परंपराओं, सामाजिक स्थिति, आर्थिक विवशताओं और सांस्कृतिक संसार का अत्यंत सजीव एवं मार्मिक चित्रण किया है।
उपन्यास का नायक सुखराम करनट एक जटिल और बहुआयामी चरित्र है। वह ऐसे सामाजिक परिवेश का प्रतिनिधि है जहाँ जन्म, जाति और परिस्थितियाँ व्यक्ति के जीवन को गहरे स्तर पर प्रभावित करती हैं। सुखराम का जीवन निरंतर संघर्ष, असुरक्षा, अभाव और सामाजिक उपेक्षा से घिरा हुआ है। वह अपने अस्तित्व, सम्मान और पहचान की तलाश में भटकता हुआ ऐसा पात्र बन जाता है, जिसके भीतर मानवीय दुर्बलताओं और संवेदनाओं का गहरा द्वंद्व चलता रहता है।
उपन्यास की महिला पात्रें भी अत्यंत प्रभावशाली हैं। वे ऐसे समाज की प्रतिनिधि हैं जहाँ निर्धनता, अशिक्षा और सामाजिक वंचना ने जीवन के नैतिक और मानवीय मूल्यों को विकृत कर दिया है। अनेक युवतियाँ और स्त्रियाँ आर्थिक अभाव तथा सामाजिक असुरक्षा के कारण शोषण का शिकार बनती हैं। उनके जीवन की त्रासदी केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि उस सामाजिक संरचना की विफलता का प्रमाण है जिसने उन्हें सम्मानजनक जीवन के अवसरों से वंचित रखा। रांगेय राघव इन पात्रों के माध्यम से स्त्री-जीवन की पीड़ा, असहायता और मानवीय संवेदनाओं को अत्यंत करुण और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करते हैं।
कब तक पुकारूँ केवल करनट समुदाय की कथा नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज में व्याप्त गरीबी, जातिगत भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार, लैंगिक असमानता और मानवीय शोषण का एक व्यापक दस्तावेज भी है। लेखक ने लोकजीवन, लोकभाषा और ग्रामीण संस्कृति के चित्रण के साथ-साथ उन ज्वलंत प्रश्नों को भी उठाया है, जो आज भी समाज के सामने चुनौती बने हुए हैं।
यह उपन्यास पाठक को केवल एक कथा नहीं सुनाता, बल्कि उसे उन लोगों के जीवन में झाँकने का अवसर देता है जिनकी आवाज़ अक्सर अनसुनी रह जाती है। अपनी मार्मिकता, सामाजिक प्रतिबद्धता और यथार्थवादी अभिव्यक्ति के कारण ‘कब तक पुकारूँ’ हिंदी साहित्य की एक कालजयी कृति है, जो पाठक को गहरे स्तर पर उद्वेलित करती है और उसे समाज की वास्तविकताओं से रूबरू कराती है।
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