कपालकुंडला बंगला साहित्य के महान उपन्यासकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की सर्वाधिक चर्चित और मार्मिक प्रेमकथाओं में से एक है। रहस्य, रोमांच, प्रेम, विश्वासघात और मानवीय भावनाओं के जटिल द्वंद्व से बुना यह उपन्यास पाठक को आरम्भ से अंत तक बाँधे रखता है।
कपालकुंडला का पालन-पोषण एक कापालिक तांत्रिक ने अपनी पुत्री के समान किया है। वन और समुद्र के एकांत परिवेश में पली-बढ़ी कपालकुंडला का संसार उसी तक सीमित है। किंतु नियति एक दिन उसके जीवन में नवकुमार को ले आती है। नवकुमार से मिलकर उसके हृदय में प्रेम का प्रथम अंकुर फूटता है और उसके जीवन की दिशा ही बदल जाती है।
जब कपालकुंडला को ज्ञात होता है कि कापालिक देवी की कृपा प्राप्त करने के लिए नवकुमार की बलि देने का षड्यंत्र रच रहा है, तब वह अपने प्राणों की परवाह किए बिना नवकुमार का जीवन बचाती है। दोनों एक-दूसरे के प्रति अपने प्रेम का इज़हार करते हैं और पति-पत्नी के रूप में जीवन व्यतीत करने लगते हैं।
परंतु यह संबंध कापालिक के लिए असह्य सिद्ध होता है। वह इसे विश्वासघात मानता है और प्रतिशोध की अग्नि में जल उठता है। बदले की भावना से प्रेरित होकर वह छल, कपट और षड्यंत्र का ऐसा जाल बुनता है कि नवकुमार के मन में कपालकुंडला के चरित्र के प्रति संदेह उत्पन्न होने लगता है। धीरे-धीरे परिस्थितियाँ इतनी विषाक्त हो जाती हैं कि प्रेम और विश्वास के स्थान पर शंका, क्रोध और विनाशकारी विचार घर कर लेते हैं।
क्या कपालकुंडला को अपने ही प्रियतम के हाथों मृत्यु का सामना करना पड़ेगा? क्या कापालिक अपनी प्रतिशोध-लिप्सा को पूर्ण कर सकेगा? प्रेम, त्याग, विश्वास और नियति के इस हृदयविदारक संघर्ष का उत्तर उपन्यास के रोमांचकारी घटनाक्रम में छिपा है।
कपालकुंडला केवल एक प्रेमकथा नहीं, बल्कि मनुष्य के अंतर्मन में चलने वाले प्रेम और प्रतिशोध, आस्था और अंधविश्वास, तथा विश्वास और संशय के शाश्वत संघर्ष की एक कालजयी गाथा है।
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