'बग़लगीर' समकालीन हिंदी कथा-साहित्य के महत्वपूर्ण रचनाकार संतोष दीक्षित का एक विचारोत्तेजक और साहसिक उपन्यास है। यह उपन्यास भारतीय समाज में धीरे-धीरे फैलते साम्प्रदायिक विष, टूटते सामाजिक सौहार्द और बदलते मानवीय रिश्तों की मार्मिक कथा प्रस्तुत करता है।
कभी एक-दूसरे के सुख-दुःख में सहभागी बनने वाले लोग किस प्रकार राजनीतिक स्वार्थ, धार्मिक कट्टरता और सामाजिक अविश्वास के कारण एक-दूसरे के विरोधी बन जाते हैं, 'बग़लगीर' इसी विडंबना की दास्तान है। लेखक ने अत्यंत संवेदनशीलता और यथार्थपरक दृष्टि के साथ दिखाया है कि साम्प्रदायिकता केवल समाज को ही नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर बसे विश्वास, प्रेम और भाईचारे को भी धीरे-धीरे नष्ट कर देती है।
उपन्यास में जहाँ एक ओर साम्प्रदायिक शक्तियों के विनाशकारी प्रभावों का चित्रण है, वहीं दूसरी ओर तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीति के पाखंड और अवसरवाद पर भी तीखा प्रश्न उठाया गया है। संतोष दीक्षित की भाषा सरल, प्रभावशाली और कथ्य के अनुरूप है, जो पाठक को अंत तक बाँधे रखती है।
'बग़लगीर' केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि हमारे समय के सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ का आईना है। यह पाठकों को सोचने पर मजबूर करता है कि नफ़रत की राजनीति के बीच इंसानियत, संवाद और सह-अस्तित्व को कैसे बचाया जाए।
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