"बेघर" समकालीन हिंदी साहित्य की चर्चित कथाकार ममता कालिया का एक महत्त्वपूर्ण और साहसिक उपन्यास है, जो आधुनिक महानगरीय जीवन, प्रेम, विवाह, स्त्री-पुरुष संबंधों और मध्यवर्गीय मानसिकता की जटिलताओं का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यह उपन्यास केवल एक टूटते हुए रिश्ते की कहानी नहीं, बल्कि उस समाज की पड़ताल है जहाँ प्रेम और विवाह के बीच की दूरी अक्सर व्यक्तियों के जीवन को गहरे स्तर पर प्रभावित करती है।
उपन्यास का केंद्र परमजीत और संजीवनी के संबंध हैं। आकस्मिक मुलाक़ात से शुरू हुआ उनका प्रेम शारीरिक और भावनात्मक निकटता तक पहुँचता है, लेकिन पारंपरिक संस्कारों, पुरुष-अहं और स्त्री की तथाकथित "पवित्रता" को लेकर बने सामाजिक मिथक उनके रिश्ते को संकट में डाल देते हैं। अंततः परमजीत एक पारंपरिक विवाह का रास्ता चुनता है, किंतु उसे वह मानसिक संतोष नहीं मिल पाता जिसकी उसे तलाश थी।
ममता कालिया इस उपन्यास में भारतीय मध्यवर्ग की उस मानसिकता को उजागर करती हैं, जहाँ आधुनिकता का दावा तो किया जाता है, लेकिन स्त्री की स्वतंत्रता और उसके व्यक्तित्व को स्वीकार करने का साहस अब भी दुर्लभ है। यह उपन्यास स्त्री-देह, प्रेम, विश्वास और विवाह से जुड़े पूर्वाग्रहों पर तीखा प्रश्नचिह्न लगाता है।
"बेघर केवल मकानविहीन होने की कथा नहीं, बल्कि उन मनुष्यों की कहानी है जो संबंधों, विश्वास और आत्मीयता से भी बेघर हो जाते हैं।"
लेखिका की भाषा सहज, तीक्ष्ण और संवादधर्मी है। वे बिना किसी आडम्बर के आधुनिक जीवन की विडंबनाओं को सामने रखती हैं। यही कारण है कि "बेघर" हिंदी के आरंभिक स्त्री-विमर्श प्रधान उपन्यासों में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।
यह उपन्यास प्रेम और विवाह के बीच के "अन्तर और अन्तराल" का संवेदनशील अध्ययन प्रस्तुत करता है और पाठकों को यह सोचने के लिए विवश करता है कि क्या संबंध केवल सामाजिक मान्यताओं से संचालित होते हैं, या उनका आधार विश्वास, समानता और मानवीय गरिमा भी होना चाहिए।
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