"दाता पीर" हिंदी के सुप्रसिद्ध कथाकार, नाटककार और रंगकर्मी Hrishikesh Sulabh का चर्चित उपन्यास है। यह कृति बिहार के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन, लोकविश्वास, सांप्रदायिक सह-अस्तित्व, स्मृति और इतिहास की बहुपरत दुनिया को अत्यंत कलात्मक ढंग से प्रस्तुत करती है। यह उपन्यास 2022 में प्रकाशित हुआ और समकालीन हिंदी साहित्य में विशेष रूप से चर्चित रहा।
उपन्यास का केंद्र "दाता पीर" की लोक-आस्था से जुड़ा संसार है, जहाँ धर्म, जाति और समुदाय की सीमाएँ मानवीय संबंधों के सामने गौण हो जाती हैं। लेखक ने बिहार के कस्बाई और ग्रामीण परिवेश को आधार बनाकर ऐसे समाज का चित्रण किया है जिसमें लोकसंस्कृति, सूफी परंपरा, साझी विरासत और मनुष्य की जिजीविषा एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं।
हृषीकेश सुलभ की लेखकीय विशेषता यह है कि वे इतिहास और लोकजीवन को केवल पृष्ठभूमि के रूप में नहीं लेते, बल्कि उन्हें जीवंत पात्रों और घटनाओं के माध्यम से वर्तमान से जोड़ते हैं। "दाता पीर" में भी अतीत और वर्तमान का संवाद निरंतर चलता रहता है। उपन्यास मनुष्य की पहचान, स्मृति, प्रेम, संघर्ष और सामाजिक परिवर्तन जैसे प्रश्नों को गहराई से उठाता है।
भाषा लोकजीवन की गंध से भरपूर, सहज और प्रभावशाली है। भोजपुरी, मगही और उत्तर भारतीय लोक-संस्कृति के रंग कथा को विशिष्ट बनाते हैं। उपन्यास में लोककथात्मकता, इतिहासबोध और यथार्थ का सुंदर समन्वय दिखाई देता है, जिससे यह केवल एक कथा न रहकर सांस्कृतिक अनुभव का दस्तावेज़ बन जाता है।
साहित्यिक दृष्टि से "दाता पीर" समकालीन हिंदी उपन्यास की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना जाता है। यह भारतीय समाज की साझी सांस्कृतिक विरासत, लोकविश्वासों और मानवीय संवेदनाओं को नए ढंग से देखने का अवसर प्रदान करता है।
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