"ढलती साँझ का सूरज" हिंदी की प्रतिष्ठित कथाकार Madhu Kankariya का एक संवेदनशील और विचारोत्तेजक उपन्यास है, जो आधुनिक जीवन की सफलता, आत्मिक रिक्तता, किसान जीवन के संकट और मनुष्य की सार्थकता की खोज को केंद्र में रखता है। यह उपन्यास सामाजिक यथार्थ, मानवीय करुणा और गहन शोध का उत्कृष्ट उदाहरण है।
उपन्यास का नायक जीवन में भौतिक सफलता प्राप्त कर लेने के बाद भी भीतर से अधूरा महसूस करता है। उसके भीतर अपनी पहचान, आत्मा, उद्देश्य और जीवन के वास्तविक अर्थ की तलाश शुरू होती है। इसी खोज के दौरान वह अपनी माँ की तलाश में उन ग्रामीण इलाकों तक पहुँचता है जहाँ कर्ज़, गरीबी, सूखा, शोषण और व्यवस्था की विफलताओं से त्रस्त किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं।
मधु कांकरिया ने इस उपन्यास में भारतीय ग्रामीण जीवन की त्रासदी, किसानों की पीड़ा, सामाजिक विषमताओं और बाजारवादी व्यवस्था के प्रभाव को अत्यंत मार्मिक ढंग से चित्रित किया है। कथा केवल किसान संकट का दस्तावेज़ नहीं बनती, बल्कि मनुष्य के भीतर चलने वाली आत्मिक यात्रा का भी आख्यान बन जाती है। नायक की माँ की खोज धीरे-धीरे जीवन, समाज और मनुष्य की खोज में बदल जाती है।
लेखिका की विशेषता है कि वे शोध और साहित्य का संतुलित संयोजन करती हैं। उनके पात्र जीवंत, बहुआयामी और मानवीय कमजोरियों तथा संघर्षों से भरे हुए हैं। उपन्यास में किसान जीवन, सामाजिक अन्याय, लोकतंत्र, पारिवारिक संबंध और मानवीय गरिमा जैसे प्रश्न गहराई से उठाए गए हैं।
साहित्यिक दृष्टि से "ढलती साँझ का सूरज" सामाजिक सरोकारों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण उपन्यास है, जो पाठक को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है। यह कृति बताती है कि जीवन की वास्तविक सफलता केवल उपलब्धियों में नहीं, बल्कि मनुष्य और समाज के प्रति संवेदनशील होने में निहित है।
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