"डूब" समकालीन हिंदी साहित्य का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण और बहुचर्चित उपन्यास है। प्रसिद्ध कथाकार वीरेन्द्र जैन द्वारा रचित यह कृति तथाकथित "विकास" की कीमत चुकाने वाले ग्रामीण समाज की त्रासदी का मार्मिक दस्तावेज़ है। यह उपन्यास बड़े बाँधों और विकास परियोजनाओं के कारण होने वाले विस्थापन, किसान जीवन के संकट और मानवीय अस्तित्व के संघर्ष को अत्यंत संवेदनशीलता और यथार्थपरकता के साथ प्रस्तुत करता है।
उपन्यास की कथा बेतवा नदी के किनारे बसे 'लड़ैई' गाँव के इर्द-गिर्द घूमती है, जो राजघाट बाँध परियोजना की डूब क्षेत्र में आ जाता है। पीढ़ियों से अपनी मिट्टी, खेत, पेड़, कुएँ और स्मृतियों से जुड़े ग्रामीणों को अचानक यह सूचना मिलती है कि विकास के नाम पर उन्हें अपना गाँव छोड़ना होगा। उनके सामने केवल घर उजड़ने का संकट नहीं, बल्कि अपनी पहचान, संस्कृति और जीवन-पद्धति के समाप्त हो जाने का भय भी खड़ा हो जाता है।
उपन्यास का केंद्रीय पात्र 'माते' ग्रामीण विवेक, प्रतिरोध और मानवीय संवेदना का प्रतीक बनकर उभरता है। उसके माध्यम से लेखक सत्ता, प्रशासन और लोकतंत्र के उस चेहरे को उजागर करते हैं, जो विकास के बड़े-बड़े वादों के पीछे आम लोगों के दुःख-दर्द को अनदेखा कर देता है।
"डूब" केवल एक गाँव के डूबने की कहानी नहीं है, बल्कि उन लाखों लोगों की सामूहिक पीड़ा की कथा है, जिन्हें विकास की परियोजनाओं के नाम पर अपनी जमीन, स्मृतियाँ और जीवन छोड़ने के लिए विवश किया जाता है। यह उपन्यास प्रश्न उठाता है कि क्या विकास का अर्थ केवल बाँध, सड़क और कारखाने हैं, या उसमें मनुष्य की गरिमा और जीवन का मूल्य भी शामिल होना चाहिए?
वीरेन्द्र जैन की भाषा सहज, आंचलिक संवेदनाओं से समृद्ध और अत्यंत प्रभावशाली है। बुंदेलखंड के लोकजीवन, रिश्तों, संघर्षों और सामाजिक ताने-बाने का सजीव चित्रण पाठक को कथा के भीतर गहरे तक ले जाता है। शैली और भाषा की दृष्टि से यह हिंदी के श्रेष्ठ आंचलिक उपन्यासों में गिना जाता है।
"डूब केवल पानी में डूबते गाँव की कहानी नहीं, बल्कि विकास की अंधी दौड़ में डूबती मानवीय संवेदनाओं का आख्यान है।"
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