‘देना-पावना’ (Dena-Paona) बंगला साहित्य के अमर कथाशिल्पी Sarat Chandra Chattopadhyay का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सामाजिक उपन्यास है, जिसमें भारतीय समाज में व्याप्त दहेज प्रथा, स्त्री की सामाजिक स्थिति, पारिवारिक संबंधों और रूढ़िवादी मानसिकता का मार्मिक एवं यथार्थवादी चित्रण किया गया है। यह कृति शरतचंद्र की उन रचनाओं में से है, जिनमें उन्होंने समाज की कुरीतियों पर तीखा प्रहार करते हुए मानवीय संवेदनाओं को केंद्र में रखा है।
‘देना-पावना’ का शाब्दिक अर्थ है—लेन-देन। किंतु उपन्यास में यह केवल आर्थिक लेन-देन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मानवीय संबंधों, सामाजिक प्रतिष्ठा, विवाह-संस्थाओं और स्त्री-अस्मिता से जुड़ा एक व्यापक प्रतीक बन जाता है। लेखक ने दिखाया है कि जब विवाह जैसी पवित्र सामाजिक संस्था को धन और दहेज के तराजू पर तौला जाने लगता है, तब उसके परिणाम कितने विनाशकारी हो सकते हैं।
उपन्यास की कथा एक ऐसे परिवार और समाज के इर्द-गिर्द घूमती है, जहाँ दहेज की समस्या केवल आर्थिक बोझ नहीं, बल्कि सामाजिक अपमान, मानसिक यातना और पारिवारिक विघटन का कारण बन जाती है। शरतचंद्र ने स्त्री-जीवन की पीड़ाओं, उसके आत्मसम्मान, उसकी सहनशीलता और उसके मौन संघर्ष को अत्यंत करुणा और संवेदनशीलता के साथ चित्रित किया है। उनकी नायिकाएँ केवल परिस्थितियों की शिकार नहीं होतीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध अपने आत्मसम्मान को बनाए रखने का साहस भी रखती हैं।
लेखक ने समाज के उस चेहरे को उजागर किया है, जहाँ मानवीय मूल्यों की अपेक्षा धन और प्रतिष्ठा को अधिक महत्व दिया जाता है। विवाह, प्रेम और पारिवारिक संबंधों के पीछे छिपी स्वार्थपरता तथा सामाजिक दिखावे की प्रवृत्ति को उन्होंने बड़ी सूक्ष्मता से पकड़ा है। इसी कारण यह उपन्यास केवल अपने समय की कथा नहीं रह जाता, बल्कि आज भी उतना ही प्रासंगिक प्रतीत होता है।
शरतचंद्र की लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सहज, प्रवाहपूर्ण और भावनात्मक शैली है। वे अपने पात्रों के मनोभावों को इतनी गहराई से चित्रित करते हैं कि पाठक उनके सुख-दुःख का सहभागी बन जाता है। ‘देना-पावना’ में भी यही गुण दिखाई देता है। उपन्यास पाठक को केवल सामाजिक समस्या से परिचित नहीं कराता, बल्कि उसे उस पीड़ा को महसूस करने के लिए विवश कर देता है जो अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्थाओं के कारण उत्पन्न होती है।
साहित्यिक दृष्टि से ‘देना-पावना’ सामाजिक यथार्थ, स्त्री-विमर्श और मानवीय करुणा का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह कृति भारतीय समाज की उन विसंगतियों पर प्रकाश डालती है, जो आज भी किसी न किसी रूप में मौजूद हैं। इसलिए यह उपन्यास केवल एक कथा नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और मानवीय मूल्यों का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है।
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