देवकी का बेटा’ हिंदी साहित्य के प्रख्यात उपन्यासकार रांगेय राघव की एक महत्वपूर्ण पौराणिक-मानवतावादी कृति है, जिसमें भगवान कृष्ण के जीवन, उनके युग और उनके व्यक्तित्व को एक नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है। यह उपन्यास केवल धार्मिक आख्यान का पुनर्कथन नहीं है, बल्कि इतिहास, मिथक और मानव जीवन की जटिलताओं का गहन विश्लेषण भी है। रांगेय राघव ने कृष्ण को चमत्कारों से घिरे देवता के रूप में नहीं, बल्कि अपने समय की सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक चुनौतियों से जूझने वाले एक असाधारण मानव व्यक्तित्व के रूप में चित्रित किया है।
उपन्यास की कथा मथुरा, गोकुल, वृंदावन और द्वारका की पृष्ठभूमि में विकसित होती है। कंस के अत्याचारों से त्रस्त समाज, सत्ता संघर्ष, जनमानस की पीड़ा और परिवर्तन की आकांक्षा इस कृति के प्रमुख आधार हैं। देवकी और वसुदेव के पुत्र कृष्ण का जन्म केवल एक बालक का जन्म नहीं, बल्कि अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध आशा के एक नए सूर्य का उदय है।
रांगेय राघव ने कृष्ण के बाल्यकाल, किशोरावस्था और युवावस्था की घटनाओं को अत्यंत संवेदनशीलता और यथार्थपरक दृष्टि से प्रस्तुत किया है। गोकुल की ग्रामीण संस्कृति, गोप-गोपियों का जीवन, यमुना तट की लोक-संवेदनाएँ और जनजीवन की सहजता उपन्यास को जीवंत बना देती हैं। लेखक ने कृष्ण के व्यक्तित्व में निहित करुणा, बुद्धिमत्ता, नेतृत्व क्षमता और संघर्षशीलता को विशेष रूप से उभारा है।
इस कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि लेखक ने पौराणिक कथाओं को आधुनिक सामाजिक दृष्टि से पुनर्परिभाषित किया है। कृष्ण यहाँ केवल बांसुरी बजाने वाले रसिक नायक नहीं हैं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने वाले जननायक, कुशल राजनीतिज्ञ, दूरदर्शी चिंतक और समाज-परिवर्तन के वाहक के रूप में सामने आते हैं। वे शोषित और पीड़ित जनसमुदाय की आशाओं का प्रतीक बन जाते हैं।
‘देवकी का बेटा’ में रांगेय राघव ने सत्ता, धर्म, नैतिकता, न्याय और मानवता जैसे प्रश्नों पर गंभीर चिंतन किया है। उपन्यास यह संकेत देता है कि प्रत्येक युग में समाज को ऐसे व्यक्तित्वों की आवश्यकता होती है जो अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध खड़े होकर जनहित की रक्षा करें। कृष्ण का चरित्र इसी संघर्षशील चेतना का प्रतिनिधित्व करता है।
भाषा की दृष्टि से उपन्यास अत्यंत प्रभावशाली, प्रवाहपूर्ण और साहित्यिक है। लेखक ने पौराणिक वातावरण का निर्माण करते हुए भी कथा को आधुनिक संवेदनाओं से जोड़े रखा है। परिणामस्वरूप यह कृति धार्मिक आख्यान से आगे बढ़कर मानव जीवन, सत्ता-संघर्ष और सामाजिक परिवर्तन की एक व्यापक कथा बन जाती है।
‘देवकी का बेटा’ हिंदी साहित्य की उन विशिष्ट कृतियों में से है, जो भारतीय पौराणिक परंपरा को आधुनिक दृष्टि से समझने का अवसर प्रदान करती हैं। यह उपन्यास पाठकों को कृष्ण के व्यक्तित्व के मानवीय, सामाजिक और ऐतिहासिक आयामों से परिचित कराता है तथा भारतीय सांस्कृतिक चेतना की गहराइयों तक ले जाता है।
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