"एक चूहे की मौत" हिंदी के चर्चित कथाकार बदीउज्ज़माँ का एक बहुचर्चित और प्रयोगधर्मी उपन्यास है। यह हिंदी साहित्य में फैंटेसी, रूपक (Allegory) और राजनीतिक-सामाजिक व्यंग्य का एक अनूठा उदाहरण माना जाता है। पहली बार 1971 में प्रकाशित यह उपन्यास आधुनिक व्यवस्था, नौकरशाही, सत्ता-तंत्र और मनुष्य के अमानवीकरण पर तीखी टिप्पणी करता है।
उपन्यास का कथानक एक विशाल "चूहाख़ाने" और वहाँ कार्यरत असंख्य "चूहेमारों" के इर्द-गिर्द घूमता है। यहाँ चूहे मारना केवल एक कार्य नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था का प्रतीक बन जाता है। छोटे, बड़े और उससे भी बड़े चूहेमारों की श्रेणियाँ, योजनाएँ, प्रस्ताव और कार्यक्रम उस नौकरशाही ढाँचे का रूपक हैं जिसमें मनुष्य की संवेदना, स्वतंत्रता और गरिमा धीरे-धीरे समाप्त होती जाती है।
बदीउज्ज़माँ ने फैंटेसी के माध्यम से एक ऐसी समाज-व्यवस्था का चित्रण किया है जो पूरी तरह मानव-विरोधी हो चुकी है। इस व्यवस्था में व्यक्ति की पहचान, उसकी इच्छाएँ और उसका अस्तित्व महत्वहीन हो जाते हैं। उपन्यास यह प्रश्न उठाता है कि जब व्यवस्था स्वयं ही मनुष्य पर हावी हो जाए, तब उसकी स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा का क्या होगा।
साहित्यिक दृष्टि से यह कृति जॉर्ज ऑरवेल के राजनीतिक रूपकों और आधुनिक अस्तित्ववादी साहित्य की परंपरा से संवाद करती हुई दिखाई देती है। लेखक ने यथार्थ को सीधे प्रस्तुत करने के बजाय प्रतीकों और रूपकों के माध्यम से उसकी भयावहता को और अधिक प्रभावशाली बना दिया है। उपन्यास का व्यंग्य तीखा है, लेकिन उसके भीतर गहरी मानवीय करुणा भी मौजूद है।
भाषा सरल, प्रभावशाली और व्यंग्यात्मक है। कथा में कल्पना और यथार्थ का ऐसा संयोजन मिलता है कि पाठक एक काल्पनिक संसार में प्रवेश करते हुए भी अपने समय, समाज और व्यवस्था को स्पष्ट रूप से पहचान लेता है। यही कारण है कि "एक चूहे की मौत" हिंदी के महत्वपूर्ण वैचारिक और प्रयोगधर्मी उपन्यासों में गिना जाता है।
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