"फुटपाथ की ज़ुबानी" संवेदनशील कथाकार हबीब कैफ़ी का एक मार्मिक और यथार्थपरक उपन्यास है, जो महानगरों की चमक-दमक के पीछे छिपी उस दुनिया की कहानी कहता है जहाँ फुटपाथ ही लाखों लोगों का घर, आश्रय और जीवन का आधार बन जाता है। यह उपन्यास समाज के उन अनदेखे और उपेक्षित चेहरों को आवाज़ देता है, जिनकी पीड़ा और संघर्ष अक्सर विकास की चकाचौंध में दब जाते हैं।
लेखक ने फुटपाथ को एक सजीव पात्र के रूप में प्रस्तुत किया है, जो अपने ऊपर गुजरने वाली अनगिनत कहानियों का साक्षी है। यहाँ मजदूर हैं, विस्थापित परिवार हैं, सपनों की तलाश में शहर आए युवा हैं, भूख और बेबसी से जूझते बच्चे हैं, और वे लोग भी हैं जिनके लिए फुटपाथ ही जीवन का अंतिम ठिकाना बन चुका है।
हबीब कैफ़ी की लेखनी सामाजिक विषमताओं, आर्थिक असमानता और मानवीय संघर्षों को गहरी संवेदनशीलता के साथ चित्रित करती है। वे पाठकों को यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि विकास की दौड़ में आखिर किन लोगों की आवाज़ें पीछे छूट जाती हैं। यह उपन्यास केवल गरीबी का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि मनुष्य की जिजीविषा, आत्मसम्मान और बेहतर जीवन की आकांक्षा का भी सशक्त आख्यान है।
"फुटपाथ की ज़ुबानी" सामाजिक यथार्थ, मानवीय संवेदनाओं और हाशिए के जीवन को समझने वाले पाठकों के लिए एक महत्त्वपूर्ण और संग्रहणीय कृति है।
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