"घाचर घोचर" कन्नड़ के विख्यात साहित्यकार Vivek Shanbhag का विश्वप्रसिद्ध लघु-उपन्यास (Novella) है, जिसने भारतीय साहित्य को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई। मूल रूप से कन्नड़ में प्रकाशित यह कृति बाद में अनेक भाषाओं में अनूदित हुई और अपनी सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक दृष्टि, पारिवारिक तनावों तथा आर्थिक समृद्धि के दुष्परिणामों के चित्रण के कारण व्यापक रूप से सराही गई।
उपन्यास की कथा एक ऐसे परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है जो कभी आर्थिक तंगी में जीवन बिताता था, लेकिन अचानक व्यापारिक सफलता के कारण सम्पन्न हो जाता है। धन के आगमन के साथ परिवार की जीवन-शैली बदलती है, परंतु साथ ही रिश्तों की गर्माहट, नैतिक मूल्य और पारिवारिक संतुलन भी धीरे-धीरे उलझने लगते हैं। यही उलझन आगे चलकर एक ऐसे वातावरण को जन्म देती है जिसे उपन्यास में "घाचर घोचर" कहा गया है—अर्थात् ऐसी गाँठ जो इतनी उलझ चुकी हो कि उसे सुलझाना लगभग असंभव हो जाए।
यह उपन्यास केवल एक परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि आधुनिक भारतीय मध्यवर्ग की महत्वाकांक्षाओं, उपभोक्तावाद, सत्ता-संबंधों और बदलते नैतिक मूल्यों का गहन अध्ययन भी है। लेखक ने अत्यंत सीमित कथानक और कम पात्रों के माध्यम से यह दिखाया है कि आर्थिक उन्नति हमेशा मानसिक और नैतिक उन्नति की गारंटी नहीं होती।
विवेक शानभाग की भाषा संयमित, सांकेतिक और गहन अर्थवत्ता से भरपूर है। वे बहुत कुछ अनकहा छोड़ते हैं, और यही अनकहा पाठक के मन में लंबे समय तक बना रहता है। साहित्यिक आलोचकों ने इसकी विशेष रूप से प्रशंसा की है कि यह छोटी-सी कृति अत्यंत गहरे मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रश्न उठाती है।
साहित्यिक दृष्टि से "घाचर घोचर" समकालीन भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह परिवार, धन, सत्ता, हिंसा, प्रेम और नैतिकता के जटिल संबंधों पर गंभीर चिंतन प्रस्तुत करता है और पाठक को अंत तक बेचैन तथा विचारशील बनाए रखता है।
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