"घर बदर" वरिष्ठ कथाकार संतोष दीक्षित का अत्यंत मार्मिक और बहुचर्चित सामाजिक-यथार्थवादी उपन्यास है। यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि उस भारतीय निम्न-मध्यवर्ग की सामूहिक त्रासदी का आख्यान है, जो जीवन भर "अपने घर" का सपना देखता है, लेकिन परिस्थितियाँ उसे लगातार विस्थापन, असुरक्षा और संघर्ष की ओर धकेलती रहती हैं।
उपन्यास का केंद्रीय पात्र कुंदू (कुंदन दूबे) है। कुंदू केवल स्वयं ही "घर बदर" नहीं है, बल्कि उसके पूर्वजों का जीवन भी विस्थापन और अस्थिरता की कहानी रहा है। उसका सबसे बड़ा सपना है—एक छोटा-सा अपना घर, जहाँ वह सम्मान और सुरक्षा के साथ रह सके। लेकिन यह साधारण-सा दिखने वाला सपना उसके लिए जीवन का सबसे कठिन संघर्ष बन जाता है।
कुछ-कुछ मुंशी प्रेमचंद के होरी की तरह कुंदू भी अपने सपने को पूरा करने के लिए निरंतर संघर्ष करता है। आर्थिक अभाव, सामाजिक दबाव, पारिवारिक जिम्मेदारियाँ और बदलती व्यवस्था उसे बार-बार तोड़ती हैं। उसके भय, कमजोरियाँ, छोटी-छोटी स्वार्थपूर्ण प्रवृत्तियाँ और मानवीय सीमाएँ उसे एक जीवंत और विश्वसनीय पात्र बनाती हैं। जैसे-जैसे कथा आगे बढ़ती है, कुंदू केवल एक व्यक्ति नहीं रह जाता; वह भारतीय समाज के उस आम आदमी का प्रतीक बन जाता है जो पूरी जिंदगी "बस रहने भर" की जगह के लिए संघर्ष करता है।
उपन्यास का कालखंड पिछली शताब्दी के उत्तरार्ध से लेकर वर्तमान समय तक फैला हुआ है। इस दौरान देश की राजनीति, अर्थव्यवस्था, बाज़ार, पारिवारिक संरचना और सामाजिक संबंधों में आए व्यापक परिवर्तनों को लेखक ने अत्यंत संवेदनशीलता से दर्ज किया है। यह पुस्तक दिखाती है कि उदारीकरण, उपभोक्तावाद और बदलती सामाजिक प्राथमिकताओं ने आम आदमी के जीवन को किस प्रकार प्रभावित किया है।
"घर बदर" समकालीन हिंदी साहित्य का एक महत्वपूर्ण सामाजिक उपन्यास है। संतोष दीक्षित की सबसे बड़ी ताकत उनकी किस्सागोई है। वे बिना किसी वैचारिक बोझ के सहज ढंग से गंभीर सामाजिक प्रश्न उठाते हैं। उनकी भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और बोलचाल की आत्मीयता से भरी हुई है, जिसके कारण पाठक कथा से गहराई से जुड़ जाता है।
यह उपन्यास केवल घर की तलाश की कहानी नहीं, बल्कि पहचान, सम्मान, सुरक्षा और अस्तित्व की तलाश की भी कहानी है। यह पाठक को यह सोचने पर विवश करता है कि आखिर एक साधारण मनुष्य के लिए "घर" का अर्थ क्या है—ईंट-पत्थर की संरचना या जीवन की सबसे बुनियादी मानवीय आवश्यकता?
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