GORA

(0 Customer Reviews)

₹240

₹299 20% OFF
  • Format: Paper Back
  • Publish Years: 2026
  • Total page: 488
  • Language: HINDI

गोरा’ रवीन्द्रनाथ ठाकुर का सर्वाधिक चर्चित, व्यापक और वैचारिक दृष्टि से परिपक्व उपन्यास है। इसका प्रकाशन वर्ष 1910 में हुआ था। यह केवल एक कथा-रचना नहीं, बल्कि उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध के भारतीय समाज, धर्म, राष्ट्रवाद, जाति-व्यवस्था और मानवीय पहचान के प्रश्नों पर लिखा गया एक गहन दार्शनिक विमर्श है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इस उपन्यास में भारतीय समाज के अंतर्विरोधों, धार्मिक कट्टरताओं, सामाजिक रूढ़ियों और राष्ट्रीय चेतना के उदय को अत्यंत संवेदनशीलता और गहराई के साथ चित्रित किया है।

उपन्यास का नायक गोरामोहन (गोरा) एक तेजस्वी, विद्वान, साहसी और कट्टर हिंदू युवक है। वह स्वयं को हिंदू धर्म और भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा प्रतिनिधि मानता है। उसके लिए हिंदू धर्म केवल एक धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय पहचान और सांस्कृतिक आत्मा का प्रतीक है। वह मानता है कि भारत की शक्ति, गौरव और एकता का आधार हिंदू धर्म है। इसलिए वह धर्म, जाति और परंपरा की रक्षा को अपना सर्वोच्च कर्तव्य समझता है।

गोरा का सबसे निकट मित्र बिनय है, जिसका स्वभाव उससे भिन्न है। जहाँ गोरा विचारों में कठोर और सिद्धांतवादी है, वहीं बिनय उदार, संवेदनशील और सहृदय है। दोनों मित्रों के माध्यम से ठाकुर ने भारतीय समाज में परंपरा और आधुनिकता, रूढ़िवाद और उदारवाद, धर्म और मानवता के बीच चल रहे वैचारिक संघर्ष को अभिव्यक्ति दी है।

कथा का एक महत्वपूर्ण पक्ष ब्रह्म समाज और रूढ़िवादी हिंदू समाज के बीच का वैचारिक द्वंद्व है। ब्रह्म समाज के उदार विचारों, स्त्री-शिक्षा, सामाजिक सुधार और धार्मिक सहिष्णुता के प्रश्नों से गोरा का सामना होता है। इसी क्रम में उसका परिचय परेश बाबू, सुचरिता और ललिता जैसे पात्रों से होता है। परेश बाबू उपन्यास के सबसे उदात्त और मानवीय चरित्रों में से एक हैं। वे धर्म को किसी संप्रदाय या कर्मकांड में नहीं, बल्कि सत्य, प्रेम और मानवता में देखते हैं।

जैसे-जैसे कथा आगे बढ़ती है, गोरा के भीतर विचारों का संघर्ष तीव्र होता जाता है। वह अपने सिद्धांतों और जीवन के अनुभवों के बीच फँसने लगता है। राष्ट्र, धर्म, समाज और मनुष्य के संबंध में उसकी स्थापित मान्यताएँ धीरे-धीरे प्रश्नों के घेरे में आने लगती हैं। उपन्यास का चरमबिंदु तब आता है जब गोरा को यह ज्ञात होता है कि वह वास्तव में किसी हिंदू ब्राह्मण परिवार की संतान नहीं है, बल्कि 1857 के विद्रोह के दौरान अनाथ हुए एक आयरिश दंपति का पुत्र है, जिसे एक हिंदू परिवार ने पाल-पोसकर बड़ा किया था।

यह रहस्योद्घाटन उसके जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी बन जाता है। जिस ब्राह्मणत्व पर उसे गर्व था, वह समाप्त हो जाता है। जिस हिंदू पहचान को उसने अपने अस्तित्व का आधार माना था, वह उससे छिन जाती है। वह अनुभव करता है कि जिन मान्यताओं की रक्षा के लिए उसने जीवन समर्पित कर दिया, उन्हीं मान्यताओं के अनुसार वह स्वयं उस समाज का सदस्य नहीं है।

किन्तु यही संकट उसके जीवन का सबसे बड़ा आत्मबोध भी बनता है। जब उसकी सभी सामाजिक और धार्मिक पहचानें टूट जाती हैं, तब वह पहली बार मनुष्य को उसकी मूल मानवता के आधार पर देख पाता है। उसे अनुभव होता है कि सत्य किसी एक धर्म, जाति या समुदाय की बपौती नहीं है। भारत किसी एक संप्रदाय का नहीं, बल्कि उन सभी लोगों का है जो इसकी भूमि, संस्कृति और मानवता से जुड़े हैं।

उपन्यास का अंतिम संदेश अत्यंत व्यापक और मानवीय है। ठाकुर यह स्थापित करते हैं कि मनुष्य की सर्वोच्च पहचान उसकी जाति, धर्म या जन्म नहीं, बल्कि उसकी मानवता है। सच्चा राष्ट्रवाद वह नहीं जो विभाजन पैदा करे, बल्कि वह है जो विविधताओं को स्वीकार कर सभी को साथ लेकर चले। इसी कारण ‘गोरा’ भारतीय साहित्य में राष्ट्रवाद और मानवतावाद के बीच संतुलन स्थापित करने वाली एक महान कृति मानी जाती है।

साहित्यिक दृष्टि से ‘गोरा’ चरित्र-चित्रण, संवाद, मनोवैज्ञानिक विश्लेषण और वैचारिक गहराई का अद्भुत उदाहरण है। गोरा, बिनय, सुचरिता, ललिता और परेश बाबू जैसे पात्र केवल कथा के पात्र नहीं, बल्कि भारतीय समाज के विभिन्न वैचारिक और सांस्कृतिक पक्षों के प्रतिनिधि हैं। उपन्यास में प्रेम, मित्रता, स्त्री-स्वतंत्रता, सामाजिक सुधार, धार्मिक सहिष्णुता, राष्ट्रीय चेतना और मानवीय मूल्यों का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।

‘गोरा’ रवीन्द्रनाथ ठाकुर की उस मानवीय दृष्टि का सशक्त दस्तावेज़ है, जिसमें धर्म से ऊपर मानवता, जाति से ऊपर मनुष्य और संकीर्ण राष्ट्रवाद से ऊपर सार्वभौमिक मानवीय चेतना को स्थान दिया गया है। यही कारण है कि यह उपन्यास आज भी भारतीय साहित्य की सर्वश्रेष्ठ कृतियों में गिना जाता है और पाठकों को आत्मचिंतन, सहिष्णुता तथा मानवता के मूल्यों की ओर प्रेरित करता है।

Related Products

KHADANER CHUPKOTHA BY PALASH PODDAR
  • 20% OFF
Apsara By Suryakant Tripathi Nirala
  • 10% OFF
Alka By Suryakant Tripathi Nirala
  • 10% OFF
Kapalkundala (Hindi)
  • 20% OFF

Kapalkundala (Hindi)

  • ₹240
  • ₹299
KAB TAK PUKARUN
  • 20% OFF

KAB TAK PUKARUN

  • ₹240
  • ₹299
Karmbhumi
  • 20% OFF

Karmbhumi

  • ₹240
  • ₹299
GANGA RATAN BIDESHI
  • 10% OFF

GANGA RATAN BIDESHI

  • ₹252
  • ₹280
GABAN
  • 20% OFF

GABAN

  • ₹240
  • ₹299
🛒 Your Shopping Cart