"हद-बेहद" समकालीन हिंदी लेखक केशव का एक संवेदनशील और विचारोत्तेजक उपन्यास है, जो मनुष्य के भीतर और बाहर खींची गई 'हदों' की पड़ताल करता है। प्रेम और घृणा, अपनापन और परायापन, परंपरा और आधुनिकता, नैतिकता और स्वार्थ—इन सबके बीच मनुष्य किस प्रकार अपने जीवन का अर्थ खोजता है, यही इस उपन्यास का केंद्रीय प्रश्न है।
उपन्यास का शीर्षक "हद-बेहद" अपने आप में एक गहरा रूपक है। 'हद' अर्थात सीमाएँ, और 'बेहद' अर्थात उन सीमाओं का अतिक्रमण। लेखक यह दिखाते हैं कि समाज ने व्यक्ति के लिए अनेक प्रकार की सीमाएँ निर्धारित कर दी हैं—जाति, वर्ग, धर्म, लिंग, संबंध और सामाजिक अपेक्षाओं की सीमाएँ। लेकिन मनुष्य का हृदय अक्सर इन सीमाओं को स्वीकार नहीं करता। उसके भीतर प्रेम, स्वतंत्रता और आत्म-अभिव्यक्ति की ऐसी आकांक्षाएँ जन्म लेती हैं जो हर निर्धारित दायरे को चुनौती देती हैं।
उपन्यास के पात्र अपने-अपने संघर्षों से गुजरते हुए जीवन के अर्थ, रिश्तों की सच्चाई और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की तलाश करते हैं। वे टूटते हैं, बिखरते हैं, समझौते करते हैं और फिर स्वयं को नए रूप में गढ़ने का प्रयास करते हैं। कथा में मानवीय संबंधों की जटिलता, भावनात्मक द्वंद्व और सामाजिक दबावों का सूक्ष्म चित्रण किया गया है।
केशव की भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण और संवेदनात्मक है। वे छोटे-छोटे प्रसंगों के माध्यम से बड़े सामाजिक और दार्शनिक प्रश्न उठाते हैं। उपन्यास पाठक को यह सोचने के लिए विवश करता है कि मनुष्य की वास्तविक पहचान उसकी सामाजिक सीमाओं से तय होती है या उसकी मानवीय संवेदनाओं से।
साहित्यिक दृष्टि से "हद-बेहद" समकालीन हिंदी का एक महत्वपूर्ण उपन्यास है, जो बदलते सामाजिक मूल्यों, रिश्तों की पुनर्व्याख्या और व्यक्ति की आंतरिक स्वतंत्रता के प्रश्नों को गहरी मानवीय दृष्टि से प्रस्तुत करता है।
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