"हसीनाबाद (एक गुमनाम बस्ती की बदनाम दास्तान)" चर्चित पत्रकार, कथाकार और स्त्री-विमर्श की सशक्त लेखिका गीताश्री का बहुचर्चित सामाजिक-राजनीतिक उपन्यास है। यह उपन्यास एक ऐसी बस्ती की कहानी कहता है, जिसे समाज ने "बदनाम" घोषित कर दिया है, लेकिन जिसके भीतर भी सपने, प्रेम, संघर्ष, कला और मनुष्यता की धड़कनें जीवित हैं।
उपन्यास की केंद्रीय पात्र गोलमी है—एक साधारण, मात्र दसवीं पास लड़की, जिसके भीतर लोकनृत्य के प्रति असाधारण जुनून है। वह उस बस्ती में जन्मी है, जहाँ लड़कियों की पहचान उनके सपनों से नहीं, बल्कि उनके शरीर और परिस्थितियों से तय की जाती है। लेकिन गोलमी इन सीमाओं को स्वीकार नहीं करती। वह नृत्य को अपनी मुक्ति, आत्म-अभिव्यक्ति और पहचान का माध्यम बनाती है।
गीताश्री ने गोलमी की जीवन-यात्रा के माध्यम से उस दुनिया का चित्रण किया है जहाँ राजनीति, अपराध, सत्ता, देह, कला और स्त्री-अस्मिता एक-दूसरे में उलझे हुए हैं। यह केवल एक लड़की की कहानी नहीं, बल्कि उन तमाम स्त्रियों की दास्तान है जो समाज के हाशिए पर रहते हुए भी अपने सपनों को मरने नहीं देतीं।
उपन्यास का सबसे प्रभावशाली पक्ष यह है कि लेखिका तथाकथित "बदनाम" बस्तियों को दया या सनसनीखेज दृष्टि से नहीं देखतीं। वे वहाँ रहने वाले लोगों की इच्छाओं, दुखों, प्रेम, महत्वाकांक्षाओं और संघर्षों को मानवीय गरिमा के साथ प्रस्तुत करती हैं। गोलमी का चरित्र प्रतिरोध, जिजीविषा और आत्मविश्वास का प्रतीक बनकर उभरता है। कहानी में रहस्य, रोमांस और राजनीतिक षड्यंत्र के तत्व भी कथा को रोचक बनाए रखते हैं।
"हसीनाबाद" स्त्री-विमर्श, सामाजिक यथार्थ और लोक-संस्कृति का अनूठा संगम है। गीताश्री की भाषा पत्रकारिता की तीक्ष्णता और साहित्यिक संवेदना का सुंदर मेल प्रस्तुत करती है। वे उन आवाज़ों को केंद्र में लाती हैं जिन्हें मुख्यधारा समाज अक्सर अनसुना कर देता है।
यह उपन्यास पाठकों को यह सोचने के लिए विवश करता है कि बदनाम वास्तव में बस्तियाँ होती हैं या उन्हें बदनाम करने वाली सामाजिक मानसिकताएँ?
Neque porro est qui dolorem ipsum quia quaed inventor veritatis et quasi
architecto var sed efficitur turpis gilla sed sit amet finibus eros. Lorem
Ipsum is
simply dummy
Your cart is empty!